लखनऊ पहुंचे अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला ने मंगलवार को विद्यार्थियों के साथ अपने जीवन और अंतरिक्ष यात्रा से जुड़े अनुभव साझा किए। इस दौरान उन्होंने छात्रों को अपनी अंतरिक्ष यात्रा के अलग-अलग पहलुओं के बारे में बताया। उन्होंने एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म के माध्यम से मिशन के सफर को भी समझाया, जिसमें अंतरिक्ष यात्रा पर जाने से लेकर वहां प्रयोग करने और भारत लौटने तक की कहानी दिखाई गई।
कार्यक्रम के दौरान शुभांशु शुक्ला ने अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखने के अनुभव का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि पृथ्वी से बाहर अंतरिक्ष में पहुंचने के बाद किसी खास शहर या क्षेत्र की पहचान करना आसान नहीं होता। इसी संदर्भ में उन्होंने छात्रों के साथ अपनी बातचीत में कहा, ‘जब आप पृथ्वी छोड़कर अंतरिक्ष में जाते हैं तो अलग फीलिंग होती है। कोई क्षेत्र नहीं, कोई शहर नहीं, लखनऊ नहीं। कोई एरिया पहचान में नहीं आता।’
शुभांशु शुक्ला ने छात्रों को समझाया कि अंतरिक्ष से देखने पर पृथ्वी का अनुभव अलग होता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, ‘मान लीजिए किसी एलियन से मुलाकात होती है और वह पूछता है कि आप कहां से हैं तो आप कहेंगे कि आई एम फ्रॉम अर्थ न कि आई एम फ्रॉम लखनऊ।’ उनकी इस बात पर कार्यक्रम में मौजूद बच्चे हंस पड़े। शुभांशु शुक्ला ने इस बातचीत के जरिए अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखने और वहां से स्थानीय क्षेत्रों की पहचान न होने के अपने अनुभव को छात्रों के सामने रखा।
बातचीत के दौरान शुभांशु शुक्ला ने अंतरिक्ष यात्रा के दौरान महसूस किए गए डर का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा, ‘जब मैं अंतरिक्ष पहुंचा तो अचानक से डर लगा।’ उन्होंने रॉकेट में यात्रा के दौरान होने वाली स्थिति की तुलना छात्रों की परीक्षा के अनुभव से की। उन्होंने कहा, ‘जो मेरे साथ रॉकेट में हुआ वो आपके साथ भी होता है परीक्षा में। थोड़ी देर के लिए सब भूल जाता है। वैसा ही मेरे साथ हुआ।’
शुभांशु शुक्ला ने आगे अपनी यात्रा की गति का उल्लेख करते हुए कहा, ‘मैं जिस स्पीड से जा रहा था, वो मेरे जीवन की सबसे तेज गति थी।’ इस बातचीत के दौरान उन्होंने छात्रों के साथ अपनी अंतरिक्ष यात्रा के अनुभवों को सरल तरीके से साझा किया और रॉकेट से अंतरिक्ष तक पहुंचने के दौरान महसूस हुई स्थिति के बारे में बताया।
कार्यक्रम में शुभांशु शुक्ला ने विद्यार्थियों को एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी दिखाई। इसके जरिए उन्होंने अंतरिक्ष मिशन के विभिन्न चरणों को समझाया। दी गई जानकारी के अनुसार, डॉक्यूमेंट्री में अंतरिक्ष यात्रा पर जाने से लेकर अंतरिक्ष में प्रयोग करने और सफलतापूर्वक भारत लौटने तक की कहानी दिखाई गई। उन्होंने यह भी बताया कि चार एस्ट्रोनॉट आए और एक मिशन पर काम किया। डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से छात्रों को इस मिशन की यात्रा और उससे जुड़े अनुभवों को समझने का अवसर मिला। विद्यार्थियों के बीच हुई इस बातचीत में शुभांशु शुक्ला ने अंतरिक्ष यात्रा को अपने व्यक्तिगत अनुभवों के संदर्भ में समझाया। इसमें रॉकेट से रवाना होने, अंतरिक्ष पहुंचने और पृथ्वी को अंतरिक्ष से देखने जैसे अनुभवों का उल्लेख किया गया।
लखनऊ दौरे के दौरान शुभांशु शुक्ला ने अपने परिवार के साथ अपनी पुस्तक ‘द सेकेंड ऑर्बिट’ का विमोचन भी किया। पुस्तक का विमोचन कार्यक्रम के दौरान किया गया। ‘द सेकेंड ऑर्बिट’ के विमोचन के साथ ही शुभांशु शुक्ला ने विद्यार्थियों के साथ अपनी अंतरिक्ष यात्रा से जुड़े अनुभव साझा किए। कार्यक्रम में डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से मिशन की यात्रा को भी प्रस्तुत किया गया।
शुभांशु शुक्ला के लखनऊ पहुंचने के दौरान विद्यार्थियों के साथ हुई बातचीत का मुख्य हिस्सा उनकी अंतरिक्ष यात्रा और उससे जुड़े व्यक्तिगत अनुभव रहे। उन्होंने अंतरिक्ष में पृथ्वी को देखने के अनुभव, रॉकेट की गति और अंतरिक्ष पहुंचने के बाद महसूस हुई स्थिति के बारे में बताया। उन्होंने छात्रों के सामने यह भी स्पष्ट किया कि अंतरिक्ष में पहुंचने के बाद पृथ्वी पर मौजूद शहरों और क्षेत्रों की पहचान उसी तरह नहीं हो पाती, जैसे जमीन से किसी स्थान को पहचाना जाता है। इसी बात को उन्होंने ‘आई एम फ्रॉम अर्थ’ वाले उदाहरण के जरिए समझाया।
कार्यक्रम में दिखाई गई डॉक्यूमेंट्री ने भी छात्रों को मिशन के विभिन्न चरणों को समझने का अवसर दिया। इसमें अंतरिक्ष यात्रा से लेकर प्रयोग और भारत वापसी तक का सफर शामिल था। लखनऊ में कार्यक्रम के दौरान शुभांशु शुक्ला ने विद्यार्थियों के साथ अपनी अंतरिक्ष यात्रा के अनुभव साझा किए और परिवार के साथ ‘द सेकेंड ऑर्बिट’ पुस्तक का विमोचन किया।
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