>बिहार का चुनावी संग्राम अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। महागठबंधन की ओर से मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के चेहरों की घोषणा के बाद सियासत गर्मा गई है। एक तरफ तेजस्वी यादव और मुकेश सहनी को क्रमशः मुख्यमंत्री और डिप्टी सीएम उम्मीदवार घोषित किया गया है, वहीं दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय को दरकिनार करने के आरोपों ने महागठबंधन की राजनीति को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
>23 अक्टूबर को आयोजित साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने महागठबंधन की ओर से यह घोषणा की कि तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री पद का चेहरा होंगे और वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी उपमुख्यमंत्री पद के दावेदार। इस ऐलान के बाद जेडीयू और बीजेपी दोनों ने सवाल उठाया कि 18% मुस्लिम आबादी वाले बिहार में इस समुदाय को शीर्ष नेतृत्व में जगह क्यों नहीं दी गई।
जेडीयू ने तंज कसा— “2.60% मल्लाह को लड्डू, 18% मुस्लिम को कद्दू!”
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>बीजेपी प्रवक्ता दानिश इकबाल ने कहा कि महागठबंधन की ‘एमवाई राजनीति’ अब खुलकर सामने आ गई है। उन्होंने कहा, “यह लोग मुस्लिमों से वोट लेते हैं, लेकिन उनके लिए कुछ नहीं करते। अब वक्त है कि बिहार के मुसलमान खुद सोचें कि उनके हित में कौन है। बीजेपी में सभी धर्मों को सम्मान मिलता है। मैं खुद मुसलमान हूं और पार्टी के मीडिया सेल का प्रमुख हूं।” दानिश ने यह भी जोड़ा कि योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मंत्रियों को जिम्मेदारी दी है जबकि बिहार में महागठबंधन सिर्फ वोट बैंक की राजनीति कर रहा है।
>जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा कि मुस्लिमों को सम्मान देना नीतीश कुमार की नीति रही है। उन्होंने याद दिलाया कि लालू प्रसाद यादव के शासनकाल में अब्दुल बारी सिद्दीकी जैसे वरिष्ठ मुस्लिम नेता को तेज प्रताप यादव के नीचे रखा गया था। नीरज ने कहा, “भागलपुर दंगे के दोषियों को सजा नीतीश कुमार ने दिलवाई थी। यह लोग केवल मुस्लिमों को डराकर वोट लेते हैं, सम्मान नहीं देते।”
>आरजेडी प्रवक्ता एजाज अहमद ने एनडीए पर पलटवार करते हुए कहा कि बीजेपी की राजनीति हमेशा नफरत पर आधारित रही है। उन्होंने कहा, “मुस्लिम समुदाय को किसी तरह की शिकायत नहीं है। महागठबंधन समानता और विकास की राजनीति करता है, जबकि बीजेपी हमेशा धर्म के नाम पर समाज को बांटने की कोशिश करती है।”
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