वैश्विक बाजार में बढ़ती अनिश्चितता के बीच भारत की आर्थिक वृद्धि को लेकर नई चिंताएं सामने आई हैं। निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान घटाकर 5.9 प्रतिशत कर दिया है, जबकि पहले इसे 7 प्रतिशत आंका गया था। यह बदलाव मध्य पूर्व में जारी तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ रहे असर के बीच किया गया है।
गोल्डमैन सैक्स ने अपनी रिपोर्ट में दर्शाया कि ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति में संभावित बाधाओं के चलते वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव बना हुआ है। इसका सीधा असर भारत जैसे शुद्ध एनर्जी इम्पोर्टर देश पर पड़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार मार्च में ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत 105 डॉलर और अप्रैल में 115 डॉलर प्रति बैरल तक रहने का अनुमान है, जो इम्पोर्ट बिल, इन्फ्लेशन और फिस्कल बैलेंस पर दबाव डाल सकता है।
इससे पहले 13 मार्च को भी बैंक ने भारत के विकास अनुमान को घटाकर 6.5 प्रतिशत किया था, जिसे अब और कम कर 5.9 प्रतिशत कर दिया गया है। यह लगभग 50 बेसिस पॉइंट की अतिरिक्त गिरावट को दर्शाता है।
महंगाई के मोर्चे पर भी स्थिति चुनौतीपूर्ण दिखाई दे रही है। गोल्डमैन सैक्स ने 2026 के लिए इन्फ्लेशन का अनुमान 3.9 प्रतिशत से बढ़ाकर 4.6 प्रतिशत कर दिया है। हालांकि यह अभी भी भारतीय रिजर्व बैंक की निर्धारित सीमा के भीतर है, लेकिन कीमतों में बढ़ोतरी के संकेत स्पष्ट हैं।
रिपोर्ट में रुपये की कमजोरी को भी एक महत्वपूर्ण फैक्टर बताया गया है। डॉलर के मुकाबले रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर के आसपास बना हुआ है, जिससे आयात महंगा हो रहा है और विदेशी मुद्रा विनिमय दर का असर खुदरा कीमतों पर पड़ने की संभावना बढ़ गई है।
गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि इन परिस्थितियों को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक अपनी मॉनेटरी नीति में बदलाव कर सकता है। पहले जहां रेपो रेट में कटौती की संभावना जताई जा रही थी, वहीं अब 50 बेसिस पॉइंट तक की बढ़ोतरी का अनुमान लगाया जा रहा है, ताकि महंगाई और मुद्रा पर दबाव को नियंत्रित किया जा सके।
रिपोर्ट में यह भी दर्शाया गया है कि भारत का चालू खाता घाटा 2026 में बढ़कर जीडीपी के लगभग 2 प्रतिशत तक पहुंच सकता है, जो बाहरी इकोनोमिकल बैलेंस के लिए एक इंडिकेटर है।
विशेषज्ञों के अनुसार कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर परिवहन, लॉजिस्टिक्स, मैन्युफैक्चरिंग और उपभोक्ता वस्तुओं पर पड़ सकता है। इससे कंपनियों की लागत बढ़ेगी और कीमतों में वृद्धि की संभावना रहेगी, जिसका असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।
गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक परिस्थितियों और ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बना हुआ है और आने वाले समय में महंगाई, वृद्धि दर और मौद्रिक नीति पर इसका असर देखने को मिल सकता है।
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