इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने गुरुवार को लखनऊ नगर निगम से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा आदेश जारी किया। अदालत ने वार्ड संख्या-73 फैजुल्लागंज (तृतीय) से निर्वाचित समाजवादी पार्टी के पार्षद ललित किशोर तिवारी को शपथ न दिलाए जाने पर नाराजगी जताते हुए लखनऊ मेयर के सभी वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार तत्काल प्रभाव से फ्रीज कर दिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक निर्वाचित पार्षद को विधिवत शपथ नहीं दिलाई जाती, तब तक नगर निगम के प्रशासनिक और वित्तीय कार्यों का संचालन जिलाधिकारी और नगर आयुक्त करेंगे।
मामला वर्ष 2023 के नगरीय निकाय चुनाव से जुड़ा है। वार्ड-73 फैजुल्लागंज (तृतीय) में भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी प्रदीप कुमार शुक्ला उर्फ टिंकू शुक्ला और समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी ललित तिवारी के बीच सीधा मुकाबला हुआ था। मतगणना के दौरान प्रदीप कुमार शुक्ला को 4,972 मत जबकि ललित तिवारी को 3,298 मत प्राप्त हुए थे। इसके आधार पर भाजपा प्रत्याशी को विजयी घोषित कर दिया गया था।
चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद सपा प्रत्याशी ललित तिवारी ने निर्वाचन को चुनौती देते हुए न्यायालय में याचिका दाखिल की थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि भाजपा प्रत्याशी ने नामांकन पत्र दाखिल करते समय निर्वाचन प्रपत्रों में आवश्यक जानकारियां उपलब्ध नहीं कराई थीं। याचिकाकर्ता का कहना था कि यह जानकारी कानूनन देना अनिवार्य था और ऐसा न करना चुनावी नियमों का उल्लंघन तथा कदाचार की श्रेणी में आता है।
मामला 13 मई 2023 को लखनऊ के अपर जिला जज की अदालत पहुंचा था। करीब ढाई वर्ष तक चली सुनवाई के दौरान अदालत ने नामांकन से जुड़े दस्तावेज, एफिडेविट, शपथ पत्र और निर्वाचन प्रपत्रों की समीक्षा की। सुनवाई के बाद अदालत ने पाया कि नामांकन प्रक्रिया में आवश्यक सूचनाएं न देना गंभीर अनियमितता है, जिससे चुनाव की वैधता प्रभावित होती है। इसी आधार पर अदालत ने प्रदीप कुमार शुक्ला का निर्वाचन निरस्त कर दिया और ललित तिवारी को वार्ड-73 से निर्वाचित पार्षद घोषित कर दिया।
निर्वाचन न्यायाधिकरण द्वारा 19 दिसंबर 2025 को निर्वाचित घोषित किए जाने के बावजूद ललित किशोर तिवारी को अब तक शपथ नहीं दिलाई गई। उन्होंने अदालत को बताया कि आदेश पारित होने के बाद भी पूर्व निर्वाचित सदस्य लगातार अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं, जबकि उन्हें विधिक रूप से कार्यभार नहीं सौंपा गया।
सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तथ्य भी रखा गया कि जिला मजिस्ट्रेट ने 23 जनवरी और 10 फरवरी 2026 को नगर आयुक्त को निर्वाचन न्यायाधिकरण के फैसले की जानकारी देते हुए उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम की धारा-85 के तहत शपथ प्रक्रिया पूरी कराने के निर्देश दिए थे। इसके अतिरिक्त राज्य सरकार ने भी 4 फरवरी 2026 को आवश्यक कार्रवाई करने के आदेश जारी किए थे।
इसके बाद 12 मई को हाईकोर्ट ने एक बार फिर आदेश देते हुए ललित तिवारी को एक सप्ताह के भीतर शपथ दिलाने का निर्देश दिया था। इस आदेश के खिलाफ भाजपा प्रत्याशी प्रदीप कुमार शुक्ला की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की गई, लेकिन वहां से भी राहत नहीं मिली और याचिका खारिज कर दी गई।
इसके बावजूद आदेश का पालन न होने पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने लखनऊ मेयर, जिलाधिकारी और नगर आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर जवाब देने के निर्देश दिए थे। गुरुवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने मेयर के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार फ्रीज करने का आदेश पारित कर दिया। अदालत ने यह भी कहा कि जब तक निर्वाचित पार्षद को शपथ नहीं दिलाई जाती, तब तक नगर निगम का संचालन जिलाधिकारी और नगर आयुक्त की देखरेख में किया जाएगा।
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