नई दिल्ली, बुधवार: भारतीय रिजर्व बैंक की एमपीसी तीन दिवसीय बैठक बुधवार को समाप्त हो गई, जिसमें केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर यथावत रखने का निर्णय लिया। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितताएं बनी हुई हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और रुपये में आई कमजोरी ने नीति निर्धारण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों के रूप में भूमिका निभाई है।
बैठक की अध्यक्षता RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने की। छह सदस्यीय MPC ने सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया कि मौजूदा परिस्थितियों में ब्याज दरों को स्थिर रखना ही उपयुक्त रहेगा, ताकि पहले की गई दर कटौतियों के प्रभाव का समुचित आकलन किया जा सके। इससे पहले केंद्रीय बैंक फरवरी 2025 से अब तक रेपो रेट में कुल 125 बेसिस पॉइंट की कटौती कर चुका है, जो वर्ष 2019 के बाद दरों में सबसे तेज कमी मानी जा रही है। दिसंबर 2025 में 25 बेसिस पॉइंट की कटौती के बाद फरवरी 2026 की बैठक में भी दरों को यथावत रखा गया था।
केंद्रीय बैंक ने अपनी मौद्रिक नीति में आर्थिक वृद्धि के अनुमानों में संशोधन करते हुए चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली और दूसरी तिमाही के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान बढ़ाया है। RBI के अनुसार, पहली तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर 6.7 प्रतिशत से बढ़ाकर 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि दूसरी तिमाही के लिए यह अनुमान 6.8 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया गया है। यह संकेत देता है कि घरेलू आर्थिक गतिविधियों में मजबूती बनी हुई है और मांग में सुधार देखने को मिल रहा है।
मुद्रास्फीति के मोर्चे पर भी केंद्रीय बैंक ने अपने अनुमान को संशोधित किया है। MPC ने पहली तिमाही के लिए महंगाई दर का अनुमान 4.0 प्रतिशत और दूसरी तिमाही के लिए 4.2 प्रतिशत रखा है। RBI का मानना है कि वैश्विक कारकों के बावजूद घरेलू स्तर पर महंगाई को नियंत्रित दायरे में रखने के प्रयास जारी रहेंगे। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने यह भी कहा कि भारत एफडीआई परियोजनाओं के लिए एक आकर्षक गंतव्य बना हुआ है, जिससे निवेश और रोजगार के अवसरों को बढ़ावा मिलने की संभावना है।
रेपो रेट उस ब्याज दर को कहा जाता है, जिस पर केंद्रीय बैंक वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक कर्ज उपलब्ध कराता है। जब बैंकों को तरलता की आवश्यकता होती है, तो वे RBI से उधार लेते हैं और इस पर उन्हें जो ब्याज देना होता है, वही रेपो रेट कहलाता है। यह दर अर्थव्यवस्था में ब्याज दरों के स्तर को प्रभावित करने का एक प्रमुख साधन है। जब महंगाई बढ़ती है, तो RBI रेपो रेट में वृद्धि करता है, जिससे कर्ज महंगा हो जाता है और बाजार में मांग पर नियंत्रण रखने में मदद मिलती है। इसके विपरीत, आर्थिक सुस्ती के दौरान रेपो रेट में कटौती कर कर्ज को सस्ता बनाया जाता है, जिससे उपभोग और निवेश को प्रोत्साहन मिलता है।
रेपो रेट का सीधा संबंध बैंकों द्वारा दिए जाने वाले लोन और उनकी ब्याज दरों से होता है। बैंक इसी दर के आधार पर अपनी लेंडिंग रेट तय करते हैं। ऐसे में यदि रेपो रेट में कमी आती है, तो फ्लोटिंग रेट या रेपो-लिंक्ड लोन सस्ते हो जाते हैं और ग्राहकों की मासिक किस्त यानी EMI में कमी आ सकती है या लोन की अवधि घट सकती है। वहीं, रेपो रेट बढ़ने पर बैंकों की उधारी महंगी हो जाती है, जिसका असर ग्राहकों पर पड़ता है और उनकी EMI बढ़ जाती है।
इस बार रेपो रेट को स्थिर रखने के फैसले का सीधा अर्थ है कि जिन ग्राहकों के लोन फ्लोटिंग रेट या रेपो-लिंक्ड हैं, उनकी EMI में फिलहाल कोई बदलाव नहीं होगा। बैंक ब्याज दरों में कोई संशोधन नहीं करेंगे, जिससे मौजूदा EMI का स्तर बना रहेगा।
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