>दीवाली से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर के लोगों को राहत देते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने ग्रीन पटाखों की बिक्री और जलाने पर लगी रोक को हटाते हुए शर्तों के साथ अनुमति दी है। हालांकि, कोर्ट ने साफ कर दिया है कि केवल ग्रीन पटाखे ही जलाए जा सकेंगे और वह भी निर्धारित समय सीमा और लाइसेंसधारी विक्रेताओं के माध्यम से ही।
>मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई की अध्यक्षता वाली बेंच ने यह निर्णय सुनाते हुए कहा कि हरियाणा के 14 जिले एनसीआर में आते हैं, जिससे राज्य का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा पटाखों पर लगी रोक से प्रभावित था। अदालत ने माना कि पिछले कुछ वर्षों से पटाखों पर प्रतिबंध के बावजूद वायु गुणवत्ता में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं देखा गया। इसलिए अब अदालत ने एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की बात कही है, ताकि लोगों की उत्सव की भावना और पटाखा उद्योग से जुड़े लाखों लोगों की आजीविका दोनों का संरक्षण हो सके।
>सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल वही उत्पादक और विक्रेता पटाखे बेच सकेंगे, जिनके पास NEERI (नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट) और PESO (पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव सेफ्टी ऑर्गनाइजेशन) का वैध लाइसेंस होगा। कोर्ट ने कहा कि बिक्री के लिए जारी सभी पटाखों पर QR कोड होना आवश्यक है, ताकि नकली या अवैध पटाखों की बिक्री रोकी जा सके। जो भी विक्रेता बिना अनुमति या गलत पटाखे बेचते पाए जाएंगे, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
>सुप्रीम कोर्ट ने यह भी तय किया कि
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पटाखे 18 अक्टूबर से 21 अक्टूबर तक ही सीमित स्थानों पर बेचे जा सकेंगे।
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दीवाली से एक दिन पहले और दीवाली के दिन सुबह 6 से 7 बजे तक और शाम 8 से 10 बजे तक ही पटाखे जलाने की अनुमति होगी।
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>इसके अलावा, पुलिस और प्रशासन को निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं ताकि नियमों का पालन सुनिश्चित किया जा सके।
>कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी सवाल उठाया कि 2018 में लगाए गए पटाखों के बैन के बाद क्या वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) में कोई सुधार हुआ? इस पर सरकार की ओर से बताया गया कि कोई खास असर नहीं पड़ा। अदालत ने कहा कि प्रदूषण के लिए केवल पटाखों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि इसमें पराली जलाना, औद्योगिक धुआं और वाहनों से निकलने वाला धुआं भी बड़ी भूमिका निभाते हैं।
>सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि “हमें उत्सव की भावना और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाना होगा। उद्देश्य यह नहीं कि लोगों की खुशियों पर रोक लगे, बल्कि यह सुनिश्चित किया जाए कि उत्सव पर्यावरण के प्रति संवेदनशील तरीके से मनाया जाए।”
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