लखनऊ, 18 सितंबर। राष्ट्रीय पोषण माह के अवसर पर उत्तर प्रदेश में बच्चों के पोषण से जुड़ा एक महत्वपूर्ण आंकड़ा सामने आया है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (एनएफएचएस-5) और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (एनएफएचएस-6) के आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में नाटापन यानी उम्र के अनुपात में कम लंबाई की समस्या में कमी दर्ज की गई है।
एनएफएचएस-5 में उत्तर प्रदेश में पांच साल से कम उम्र के 39.7 प्रतिशत बच्चे नाटेपन की श्रेणी में दर्ज किए गए थे। एनएफएचएस-6 में यह आंकड़ा घटकर 31.5 प्रतिशत रह गया। इस तरह दोनों सर्वेक्षणों के बीच 8.2 प्रतिशत अंक की कमी दर्ज की गई है। नाटापन बच्चों में लंबे समय तक रहने वाले कुपोषण का एक महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। इसके पीछे गर्भावस्था के दौरान मां का पोषण, जन्म के समय बच्चे की स्थिति, स्तनपान, छह महीने के बाद पूरक आहार, संक्रमण और शुरुआती वर्षों में मिलने वाला पोषण जैसे कई कारक जुड़े होते हैं।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की मिशन निदेशक डॉ. पिंकी जोवल ने कहा कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और विविध आबादी वाले राज्य में बच्चों के नाटेपन के आंकड़ों में कमी महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि बच्चे की लंबाई में सुधार एक दिन में नहीं आता और यह लंबे समय तक बेहतर पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं तथा परिवार की देखभाल से जुड़ा होता है। उनके अनुसार एनएफएचएस-5 से एनएफएचएस-6 के बीच नाटेपन के आंकड़ों में आई गिरावट प्रदेश में बच्चों के स्वास्थ्य की बदलती तस्वीर का एक महत्वपूर्ण संकेत है। साथ ही उन्होंने कहा कि अभी भी बड़ी संख्या में बच्चे इस समस्या से प्रभावित हैं। डॉ. पिंकी जोवल के मुताबिक बच्चों के शुरुआती वर्षों में पोषण की निगरानी, गर्भवती महिलाओं के पोषण, छह माह तक केवल स्तनपान, समय पर पूरक आहार, संक्रमण की रोकथाम और बच्चों की नियमित वृद्धि निगरानी पर लगातार ध्यान देने की जरूरत है।
यह खबर भी पढ़े - UPPSC-2025: मुफ्त कोचिंग से 74 अभ्यर्थी मुख्य परीक्षा में सफल
प्रदान की गई जानकारी के अनुसार, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर गर्भवती महिलाओं को पोषण और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। इस दौरान गर्भवती महिलाओं को पोषण पोटली भी वितरित की जा रही है। मातृ पोषण को बच्चों के स्वास्थ्य से जोड़कर देखा जाता है। गर्भावस्था के दौरान मां को मिलने वाला पोषण बच्चे के शुरुआती विकास के लिए महत्वपूर्ण होता है। इसी कारण मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं के तहत गर्भावस्था से लेकर बच्चे के शुरुआती वर्षों तक पोषण और स्वास्थ्य देखभाल पर जोर दिया जा रहा है।
किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के बाल रोग विभाग की प्रोफेसर डॉ. शालिनी त्रिपाठी के अनुसार, बच्चे के जीवन के शुरुआती 1,000 दिन उसके शारीरिक और मानसिक विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इसमें गर्भावस्था की अवधि से लेकर बच्चे के दो वर्ष की उम्र तक का समय शामिल है। उन्होंने बताया कि इस अवधि में पर्याप्त पोषण, नियमित स्वास्थ्य जांच, समय पर टीकाकरण, स्तनपान और उचित पूरक आहार पर ध्यान देने से कुपोषण की स्थिति को कम करने में मदद मिल सकती है। डॉ. शालिनी त्रिपाठी के अनुसार आंगनबाड़ी केंद्रों, स्वास्थ्य विभाग और समुदाय के स्तर पर संचालित पोषण तथा मातृ-शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रमों की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है।
प्रदान की गई जानकारी के मुताबिक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश और सक्षम आंगनबाड़ी एवं पोषण-2.0 की गाइडलाइन के तहत हॉट कुक्ड मील योजना संचालित की जा रही है। इस योजना के तहत तीन से छह वर्ष तक की उम्र के बच्चों को नियमित रूप से ताजा, गर्म और पौष्टिक पका हुआ भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है। प्रदेश में करीब 1.45 लाख को-लोकेटेड और 0.44 लाख नॉन-को-लोकेटेड आंगनबाड़ी केंद्र बताए गए हैं। इन आंगनबाड़ी केंद्रों पर आने वाले लगभग 32.88 लाख बच्चे नियमित रूप से योजना का लाभ ले रहे हैं। योजना का उद्देश्य बच्चों को शुरुआती वर्षों में पोषण उपलब्ध कराने और उनके विकास से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने में सहायता करना है।
बाल रोग विशेषज्ञों के अनुसार नाटापन बच्चों में लंबे समय तक रहने वाले कुपोषण का एक महत्वपूर्ण संकेतक है। इसे केवल बच्चे की लंबाई से जोड़कर नहीं देखा जाता। इसके पीछे कई स्वास्थ्य और पोषण संबंधी परिस्थितियां हो सकती हैं। गर्भावस्था के दौरान मां का पोषण, बच्चे का जन्म के समय स्वास्थ्य, जन्म के बाद स्तनपान, छह माह की उम्र के बाद पूरक आहार, बार-बार होने वाले संक्रमण और शुरुआती वर्षों में पर्याप्त पोषण जैसे कारक बच्चे की वृद्धि से जुड़े होते हैं। इसी वजह से बच्चों की वृद्धि की नियमित निगरानी और शुरुआती उम्र में पोषण संबंधी हस्तक्षेप को महत्वपूर्ण माना जाता है।
एनएफएचएस-5 के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में नाटापन 39.7 प्रतिशत दर्ज किया गया था। इसी सर्वेक्षण में 17.3 प्रतिशत बच्चे दुबलेपन यानी वेस्टिंग और 32.1 प्रतिशत बच्चे कम वजन की श्रेणी में दर्ज किए गए थे। नाटापन उम्र के अनुपात में बच्चे की लंबाई कम होने को दर्शाता है, जबकि वेस्टिंग बच्चे के कद के अनुपात में कम वजन की स्थिति से संबंधित है। कम वजन एक अलग पोषण संकेतक है, जिसमें बच्चे का वजन उसकी उम्र के हिसाब से कम होता है। इन संकेतकों का इस्तेमाल बच्चों की पोषण स्थिति का आकलन करने के लिए किया जाता है।
एनएफएचएस-6 के आंकड़ों में देशभर में पांच साल से कम उम्र के बच्चों के नाटेपन में भी कमी दर्ज की गई है। राष्ट्रीय स्तर पर नाटापन 35.5 प्रतिशत से घटकर 29.3 प्रतिशत हुआ है। उत्तर प्रदेश में इसी अवधि में यह आंकड़ा 39.7 प्रतिशत से घटकर 31.5 प्रतिशत दर्ज किया गया। इस तरह उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में नाटेपन में 8.2 प्रतिशत अंक की कमी दर्ज हुई, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर कमी 6.2 प्रतिशत अंक रही।
नाटेपन के आंकड़ों में कमी के बावजूद एनएफएचएस-6 में उत्तर प्रदेश के पांच साल से कम उम्र के 31.5 प्रतिशत बच्चे इस श्रेणी में दर्ज हुए हैं। उपलब्ध जानकारी में इसे शुरुआती वर्षों में पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं और वृद्धि निगरानी पर निरंतर ध्यान देने की आवश्यकता से जोड़ा गया है। पोषण से जुड़े कार्यक्रमों में गर्भवती महिलाओं के पोषण, बच्चों के लिए स्तनपान और पूरक आहार, संक्रमण की रोकथाम तथा नियमित स्वास्थ्य जांच जैसे पहलुओं पर ध्यान दिया जा रहा है। आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से बच्चों को पोषण उपलब्ध कराने के साथ मातृ-शिशु स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाओं को समुदाय तक पहुंचाने पर भी जोर है।
Explore Related Topics
टिप्पणियाँ
टिप्पणी करने के लिए लॉगिन करें