महापुरुषों की जयंती से आने वाले चुनाव में दलित वोट बैंक पर सभी दलों की नजर

कांशीराम से आंबेडकर तक कार्यक्रमों की भरमार, बीजेपी-सपा-बसपा-कांग्रेस ने तेज की चुनावी तैयारी
Bureau 08 Apr 2026, 02:14 PM 1 min read
महापुरुषों की जयंती से आने वाले चुनाव में दलित वोट बैंक पर सभी दलों की नजर

उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 के प्रस्तावित विधानसभा चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज हो गई है। प्रमुख राजनीतिक दल महापुरुषों की जयंती और पुण्यतिथियों के जरिए सामाजिक समीकरण साधने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। दलित वोट बैंक को लेकर बीजेपी, सपा, बसपा और कांग्रेस के बीच प्रतिस्पर्धा स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है।

 

आगामी महीनों में पड़ने वाली महापुरुषों की जयंती और पुण्यतिथियों को लेकर सभी दलों ने व्यापक स्तर पर कार्यक्रमों की योजना बनाई है। इन आयोजनों के जरिए मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने और सामाजिक संदेश देने की कोशिश की जा रही है।

 

हाल ही में कांशीराम जयंती के अवसर पर विभिन्न दलों द्वारा अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित किए गए। इस दौरान दलित मतदाताओं को अपने पक्ष में करने को लेकर आरोप-प्रत्यारोप भी देखने को मिले।

 

कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग उठाई, जबकि बसपा ने इस पर सवाल खड़े किए। वहीं बीजेपी ने विपक्षी दलों के रुख पर टिप्पणी करते हुए इसे चुनावी रणनीति बताया।

 

आंबेडकर जयंती पर फोकस, सरकार का बड़ा फैसला - अब राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र 14 अप्रैल को होने वाली डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती पर आ गया है। बसपा ने अपने कार्यकर्ताओं को लखनऊ बुलाने का आह्वान किया है, जबकि सपा और कांग्रेस भी अलग-अलग कार्यक्रमों की तैयारी में हैं। इसी बीच राज्य सरकार ने 7 अप्रैल को कैबिनेट बैठक में सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में आंबेडकर की प्रतिमाओं के सम्मान और विकास के लिए 403 करोड़ रुपये आवंटित करने का निर्णय लिया है।

 

दलित वोट बैंक पर बढ़ती प्रतिस्पर्धा: राजनीतिक दलों के बीच दलित वोट बैंक को लेकर प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। एक ओर बसपा खुद को इस वर्ग का पारंपरिक प्रतिनिधि मानती है, वहीं अन्य दल भी इस वोट बैंक में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश में हैं। हाल के चुनावों में दलित मतों के रुझान को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं, जिससे राजनीतिक रणनीतियों में बदलाव भी देखा जा रहा है।

 

बीजेपी की रणनीति: प्रतीक और योजनाओं का समन्वय - भारतीय जनता पार्टी दलित समाज को जोड़ने के लिए प्रतीकात्मक और विकास आधारित दोनों स्तरों पर काम कर रही है। महापुरुषों के नाम पर योजनाएं, स्मारकों का विस्तार और सामाजिक संदेशों के जरिए व्यापक पहुंच बनाने की कोशिश की जा रही है। पार्टी संगठन स्तर पर भी संपर्क अभियान चलाकर विभिन्न वर्गों के बीच संवाद बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।

 

बीजेपी प्रदेश प्रवक्ता अवनीश त्यागी ने कहा, बीजेपी ने दलित वर्ग के लिए सबसे ज्यादा काम किया है। पहले की सरकारों ने सिर्फ नारे दिए, जबकि हमारी सरकार ने उत्थान और सम्मान दोनों पर काम किया है।

 

बसपा का जोर: पारंपरिक आधार को मजबूत करना - बहुजन समाज पार्टी अपने कोर वोट बैंक को बनाए रखने के लिए संगठन को सक्रिय करने में जुटी है।  गांव-गांव कार्यक्रमों और जयंती आयोजनों के जरिए पार्टी दलित समाज में अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास कर रही है।

 

सपा का पीडीए फॉर्मूला: समाजवादी पार्टी पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) समीकरण को मजबूत करने पर फोकस कर रही है।

संविधान, आरक्षण और सामाजिक न्याय के मुद्दों के जरिए दलित समुदाय तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। सपा के प्रदेश प्रवक्ता अशोक यादव ने कहा, बीजेपी का दलित प्रेम सिर्फ चुनावी है। सामाजिक न्याय की लड़ाई सपा ही लड़ती है और आगे भी लड़ती रहेगी।

 

कांग्रेस की रणनीति: जमीनी स्तर पर संवाद: कांग्रेस गांव और मोहल्ला स्तर पर संपर्क बढ़ाने के जरिए दलित समुदाय के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास कर रही है। संविधान और आरक्षण जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर भरोसा बनाने की रणनीति अपनाई जा रही है।

 

कांग्रेस प्रवक्ता अंशू अवस्थी के अनुसार, बीजेपी केवल चुनावी योजनाएं लाती है। कांग्रेस ने अपने शासनकाल में दलितों के लिए ठोस काम किया है और आगे भी करती रहेगी।

 

विश्लेषकों की नजर में दलित वोट निर्णायक: राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, अवध और पूर्वांचल क्षेत्रों में दलित वोट कई सीटों पर हार-जीत तय कर सकता है। इसी कारण सभी दल इस वर्ग पर विशेष ध्यान केंद्रित कर रहे हैं और अपनी-अपनी रणनीतियों को धार दे रहे हैं।

← Previous Story Next Story →

 

टिप्पणियाँ

टिप्पणी करने के लिए लॉगिन करें