>उत्तर प्रदेश सरकार ने मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर सख्ती से लगाम कसने के लिए एक ऐतिहासिक और निर्णायक कदम उठाया है। अब राज्य में मॉब लिंचिंग के सभी मामलों की मासिक समीक्षा की जाएगी और हर जिले से रिपोर्ट सीधे गृह विभाग को भेजनी होगी। इसके साथ ही, ऐसे मामलों की कानूनी प्रक्रिया को पारदर्शी, विवेकपूर्ण और तथ्यपरक रखने के लिए विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए गए हैं।
>भीड़ हिंसा को लेकर साफ निर्देश
>सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी व्यक्ति की हत्या किसी पारिवारिक विवाद, भूमि विवाद या लूटपाट की स्थिति में भीड़ द्वारा की जाती है, तो ऐसे मामलों में सीधे मॉब लिंचिंग की धारा न लगाई जाए।
>भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(2) के तहत यदि किसी समूह ने जानबूझकर नफरत, जाति, नस्ल, धर्म या किसी अन्य कारण के आधार पर किसी व्यक्ति की हत्या की है, तो यह मॉब लिंचिंग माना जाएगा और इसमें मृत्युदंड या आजीवन कारावास तक की सजा दी जा सकती है।
>हर आरोपी को समान सजा: कानून में स्पष्ट प्रावधान
>यदि पांच या उससे अधिक लोगों के समूह द्वारा किसी व्यक्ति की हत्या की जाती है, तो उसमें सभी आरोपियों पर समान सजा का प्रावधान रहेगा। यह कानून सभी के लिए समान है और इसे संयम, विवेक और संवेदनशीलता के साथ लागू करने के निर्देश दिए गए हैं ताकि किसी निर्दोष व्यक्ति को अन्याय का शिकार न बनना पड़े।
>नोडल अधिकारी और ज़िम्मेदारी तय
>हर जिले में एएसपी स्तर के अधिकारी को नोडल अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश दिया गया है। इन मामलों में केवल पर्याप्त साक्ष्य होने के बाद, सीओ या वरिष्ठ अधिकारी के अनुमोदन पर ही एफआईआर दर्ज की जा सकेगी। संवेदनशील इलाकों की पहचान की जाएगी और अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होगी।
>क्या होती है मॉब लिंचिंग?
>मॉब लिंचिंग का मतलब होता है जब भीड़ बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के खुद ही किसी को सजा देने लगती है चाहे वह अपराधी हो या निर्दोष। कभी-कभी महज अफवाहों के आधार पर भी लोगों की पिटाई कर हत्या तक कर दी जाती है। यह एक पूर्णतः गैरकानूनी और असंवैधानिक कृत्य है।
>भारत में मॉब लिंचिंग के कई कुख्यात उदाहरण सामने आ चुके हैं, जिनमें 2017 का पहलू खान हत्याकांड सबसे चर्चित है। अफवाह और नफरत के नाम पर जब भीड़ खुद को कानून मान ले, तब लोकतंत्र की नींव हिलने लगती है।
टिप्पणियाँ
टिप्पणी करने के लिए लॉगिन करें