नई दिल्ली, बुधवार: ट्रांसजेंडर व्यक्तियों से जुड़े कानून में हालिया संशोधनों को लेकर विवाद बढ़ गया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को ट्रांसजेंडर पर्सन्स प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स संशोधन अधिनियम, 2026 की प्रमुख धाराओं को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। कोर्ट की पीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया शामिल थे, कोर्ट ने इस मामले में केंद्र से हलफनामा दाखिल करने को कहा और मामले की अगली सुनवाई 22 जुलाई तय की।
संशोधन कानून की प्रमुख धाराओं पर सवाल: याचिकाओं में विशेष रूप से ट्रांसजेंडर की परिभाषा में बदलाव और प्रमाणन के लिए स्व-घोषित पहचान को हटाए जाने को चुनौती दी गई है। एक याचिका अधिवक्ता चंद्रेश जैन और दूसरी लक्षय जैन द्वारा दायर की गई है।
संसद से पास होकर बना कानून: ट्रांसजेंडर पर्सन्स प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स एक्ट, 2019 में संशोधन के लिए विधेयक 24 मार्च को लोकसभा और 25 मार्च को राज्यसभा में पारित हुआ था। विपक्ष ने विधेयक को स्थायी समिति के पास भेजने की मांग की थी, लेकिन इसे ध्वनिमत से पास कर दिया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी के बाद 30 मार्च को यह कानून बन गया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला: याचिका में कहा गया है कि यह संशोधन सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी बनाम भारत संघ यानी नालसा केस के खिलाफ है। उस फैसले में शीर्ष अदालत ने जेंडर पहचान को व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता और निजता का अभिन्न हिस्सा मानते हुए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पहचान स्वयं निर्धारित करने का अधिकार दिया था।
राज्य का नियंत्रण बढ़ाने का आरोप: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि संशोधन के जरिए जेंडर पहचान पर राज्य का नियंत्रण फिर से स्थापित किया जा रहा है। सत्यापन और प्रमाणन की प्रक्रिया को अनिवार्य बनाकर इसे अधिकार आधारित व्यवस्था से हटाकर एक नियामक ढांचे में बदला जा रहा है।
मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का दावा: याचिका में कहा गया है कि यह संशोधन संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a) और 21 का उल्लंघन करता है। यह संशोधन व्यक्ति की गरिमा, निजता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता का हनन करता है। जेंडर पहचान जैसे व्यक्तिगत विषय को राज्य की जांच के दायरे में लाना मनमाना और असंगत है, याचिका में कहा गया।
मेडिकल बोर्ड और जैविक मानदंड पर आपत्ति: याचिका में मेडिकल बोर्ड और जैविक मानदंड जैसे की जननांग, क्रोमोसोम और हार्मोन को आधार बनाने को “दखल देने वाला” बताया गया है। जिसके तहत, इस तरह की व्यवस्था शारीरिक अखंडता और व्यक्तिगत स्वायत्तता के अधिकार के विपरीत है। साथ ही, नई परिभाषा को “संकीर्ण, जैविक रूप से निर्धारित और बहिष्करणकारी” बताया गया है, जिससे स्व-पहचान आधारित व्यक्तियों को कानूनी मान्यता से वंचित किया जा सकता है।
अगली सुनवाई 22 जुलाई को: दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 22 जुलाई को होगी, जहां संशोधन की संवैधानिक वैधता पर आगे बहस होने की संभावना है।
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