योग को लोक से जोड़ने वाले प्रथम जनगुरु: गुरु गोरखनाथ की परंपरा में वैश्विक योग

News Desk 18 Jun 2025, 06:01 AM 1 min read
योग को लोक से जोड़ने वाले प्रथम जनगुरु: गुरु गोरखनाथ की परंपरा में वैश्विक योग


>21 जून को पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने जा रही है। भारत में इस दिन को लेकर विशेष उत्साह है - और होना भी चाहिए, क्योंकि योग इस देश की हजारों वर्षों पुरानी आध्यात्मिक विरासत है। वेदों से लेकर महाभारत, रामायण और उपनिषदों तक, योग का स्वरूप सतत विकसित हुआ है। किंतु जिस महापुरुष ने योग को जनजीवन से जोड़ा, उसे गुफाओं और वनों से निकालकर समाज के केंद्र में रखा - वह थे गुरु गोरखनाथ


>गुरु गोरखनाथ: योग के लोककल्याणकारी स्वरूप के जनक


>जब महर्षि पतंजलि ने योग को शास्त्रबद्ध किया, तब भी यह मुख्यतः साधकों तक सीमित था। लेकिन गुरु गोरखनाथ ने इस सिद्ध विद्या को आमजन की पहुंच में लाकर उसे सामाजिक और व्यावहारिक स्वरूप दिया। उन्होंने बताया कि योग केवल मोक्ष या साधना का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन के हर आयाम को संतुलित करने की क्रिया है - चाहे वह गृहस्थ हो, संत हो, स्त्री हो या पुरुष।


>नाथ योगियों ने बताया कि योग जाति, धर्म, लिंग या उम्र की सीमाओं से परे, मानव जीवन के लिए सबसे सरल, सुलभ और वैज्ञानिक उपाय है।


>नाथ संप्रदाय और गुरु गोरखनाथ का प्रभाव


>नाथ परंपरा की उत्पत्ति भगवान शिव से मानी जाती है। शिव से प्राप्त तत्वज्ञान को मत्स्येन्द्रनाथ ने आगे बढ़ाया और फिर गोरक्षनाथ ने इसे सुव्यवस्थित योग मार्ग के रूप में लोक में प्रसारित किया। तिब्बत, मंगोलिया, श्रीलंका, अफगानिस्तान जैसे देशों तक उनकी यात्रा और प्रभाव इस बात का प्रमाण हैं कि योग को उन्होंने मानव मात्र के कल्याण का माध्यम बनाया।


>योग को वामाचार से निकालकर सात्विकता की ओर ले गए


>गुरु गोरखनाथ ने उस समय योग को वामाचार की अतियों से निकालकर सात्विकता, सदाचार और साधना की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने कहा, "ज्ञान सबसे बड़ा गुरु है और चित्त सबसे बड़ा शिष्य, इन्हें साधकर ही शिवत्व की प्राप्ति संभव है।"


>उनकी रचनाओं में - गोरक्षशतक, गोरखगीता, योगमार्तण्ड, अमनस्क योग, गोरक्ष कल्प जैसे ग्रंथ - आज भी योग साधना के पथदर्शक हैं।


>योग: लोकजीवन के उन्नयन का साधन


>प्रसिद्ध विद्वान जॉर्ज गियर्सन के अनुसार, गोरखनाथ ने योग को न केवल साधना का मार्ग बनाया, बल्कि लोकजीवन के नैतिक और आत्मिक उन्नयन का भी माध्यम बनाया। उनके योग में दर्शन कम, व्यवहार अधिक है। उनका योग आत्म-प्रकाश और चित्त-शुद्धि पर आधारित है, न कि केवल योगिक मुद्राओं तक सीमित।


>गोरक्षपीठ: योग परंपरा का जीवंत केंद्र


>गोरखनाथ जी की परंपरा आज भी गोरक्षपीठ में जीवंत है। यहाँ महायोगी गोरखनाथ संस्थान के माध्यम से प्रशिक्षित योगगुरु लोगों को योग का सैद्धांतिक और व्यावहारिक प्रशिक्षण देते हैं। वर्तमान में गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ स्वयं भी योग के प्रचार-प्रसार में जुटे हैं। उनकी पुस्तक "हठयोग: स्वरूप और साधना" योग की गूढ़ विषय-वस्तु को सरलता से प्रस्तुत करती है।


>हर साल यहां योग दिवस के उपलक्ष्य में 15 जून से साप्ताहिक योग शिविर आयोजित होता है, जिसमें विभिन्न योगासनों, प्राणायाम, ध्यान की विधियों का अभ्यास कराया जाता है। साथ ही आयुर्वेद, राष्ट्रवाद और जीवनशैली जैसे विषयों पर विशेषज्ञों के व्याख्यान भी होते हैं।


>योग: भारत की संस्कृति जितना ही प्राचीन


>योग की परंपरा भारत की सांस्कृतिक चेतना जितनी ही पुरानी है। मोहनजोदड़ो की मूर्तियों से लेकर महाभारत और गीता तक, हर युग में योग का स्वरूप रहा है। आज योग न सिर्फ एक चिकित्सा विधि है, बल्कि जीवनशैली है, आत्मबोध का माध्यम है और शांति की वैश्विक भाषा भी।

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