लखनऊ जिला एवं सत्र अदालत परिसर के आसपास सार्वजनिक सड़क, फुटपाथ और उपयोगिता भूमि पर बने अवैध चैंबरों और अन्य निर्माणों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने केंद्रीय बार एसोसिएशन, लखनऊ की ओर से दाखिल याचिका खारिज कर दी। इसके बाद करीब 72 चिन्हित चैंबरों और अन्य निर्माणों को हटाने की प्रशासनिक कार्रवाई के सामने मौजूद प्रमुख कानूनी अड़चन दूर हो गई है।
मामला अब लखनऊ जिला प्रशासन, नगर निगम और संबंधित विभागों की अगली कार्रवाई पर केंद्रित है। हाईकोर्ट के पहले के निर्देशों के अनुसार सार्वजनिक रास्तों और सरकारी उपयोग की भूमि पर बने निर्माणों की पहचान तथा उनके कानूनी अधिकार की जांच की जानी है। जिन निर्माणों के संबंध में वैध स्वामित्व या अन्य कानूनी अधिकार साबित नहीं होंगे, उनके खिलाफ हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है।
लखनऊ कचहरी के आसपास लंबे समय से बड़ी संख्या में वकीलों के चैंबर और अन्य ढांचे मौजूद हैं। मामले में आरोप है कि करीब 72 निर्माण सार्वजनिक सड़क, फुटपाथ अथवा उपयोगिता भूमि पर बने हैं।
इस विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने पहले ही नगर निगम को ऐसे निर्माणों को चिन्हित करने और संबंधित लोगों को अंतिम नोटिस देने के निर्देश दिए थे। अदालत ने यह भी कहा था कि जिस व्यक्ति के पास संबंधित भूमि पर वैध स्वामित्व या कानूनी अधिकार है, वह उसके दस्तावेज प्रस्तुत कर सकता है।
निर्धारित प्रक्रिया में कानूनी अधिकार साबित नहीं होने की स्थिति में संबंधित निर्माण को हटाने की कार्रवाई का प्रावधान सामने आया। इसी प्रक्रिया को लेकर अधिवक्ताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट का रुख किया गया था।
छह अगस्त को हाईकोर्ट ने लखनऊ नगर निगम को अदालत परिसर के आसपास सार्वजनिक मार्गों पर बने अवैध चैंबरों और ढांचों की पहचान करने के निर्देश दिए थे। इसके साथ ही कब्जेदारों को अंतिम नोटिस जारी करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने को कहा गया था।
अदालत के निर्देशों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह था कि संबंधित लोग जमीन पर अपने वैध अधिकार का प्रमाण प्रस्तुत कर सकें। इससे उन निर्माणों को अलग करने की प्रक्रिया तय हुई, जिनके पीछे वैध स्वामित्व या कानूनी अधिकार मौजूद हो सकता है। मामले में प्रस्तावित कार्रवाई की तारीख 30 अगस्त बताई गई थी। इसी कार्रवाई को रोकने के उद्देश्य से केंद्रीय बार एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अधिवक्ताओं की ओर से यह दलील रखी गई कि संबंधित लोगों के लिए बैठने और काम करने की पर्याप्त वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध नहीं है। बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं के नियमित कामकाज को देखते हुए चैंबर हटाए जाने का मुद्दा भी उठाया गया।
हालांकि सुनवाई के दौरान अदालत का रुख इस बात पर केंद्रित रहा कि सार्वजनिक सड़क, फुटपाथ या सरकारी उपयोग की भूमि पर अतिक्रमण को केवल इस आधार पर संरक्षण नहीं दिया जा सकता कि उसका इस्तेमाल अधिवक्ताओं द्वारा किया जा रहा है।
अदालत के समक्ष यह पहलू भी आया कि कुछ निर्माण बार एसोसिएशन से जुड़े पदाधिकारियों या अधिवक्ताओं के इस्तेमाल में हैं। कोर्ट ने इस आधार को भी पर्याप्त नहीं माना कि किसी निर्माण का इस्तेमाल किसी वकील या बार पदाधिकारी द्वारा किया जा रहा है।
सुनवाई के दौरान सार्वजनिक मार्गों पर अतिक्रमण के प्रभाव का मुद्दा भी सामने आया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अदालत ने माना कि कचहरी परिसर के आसपास सार्वजनिक रास्तों पर अतिक्रमण से आम लोगों की आवाजाही और न्यायिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।
मुख्य मार्गों और आसपास के क्षेत्रों में कब्जे की वजह से यातायात तथा सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित होने की बात भी सुनवाई के दौरान सामने आई। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने लखनऊ में अतिक्रमण की स्थिति का अपने अनुभव के आधार पर उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि उन्होंने स्वयं मुख्य सड़कों पर कब्जे के कारण यातायात प्रभावित होते देखा है।
अधिवक्ताओं की ओर से प्रभावित लोगों के लिए वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराने का प्रस्ताव भी रखा गया था। इसके अलावा विवाद को मध्यस्थता के जरिए हल करने की बात भी सामने आई।
सुप्रीम कोर्ट ने अतिक्रमण हटाने से जुड़े इस मामले में मध्यस्थता के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। सुनवाई में अदालत का रुख यह रहा कि सार्वजनिक रास्तों और सरकारी उपयोग की भूमि पर अतिक्रमण को केवल बातचीत या मध्यस्थता के आधार पर बनाए रखने का आधार नहीं बन सकता। इससे मामले का फोकस अब उन निर्माणों की कानूनी स्थिति और प्रशासनिक कार्रवाई पर अधिक केंद्रित हो गया है।
अधिवक्ताओं की ओर से सुनवाई के दौरान एक प्रमुख दलील यह रही कि लखनऊ जिला न्यायालय में करीब 27 हजार अधिवक्ता प्रैक्टिस करते हैं। उनके लिए पर्याप्त अधिकृत चैंबर और बैठने की जगह उपलब्ध नहीं होने की बात कही गई।
इसी कमी के कारण बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं ने लंबे समय से अपने उपयोग के लिए चैंबर बनाए हुए हैं। अधिवक्ताओं का पक्ष है कि अगर ऐसे सभी निर्माण हटा दिए जाते हैं तो बड़ी संख्या में वकीलों के सामने बैठने और काम करने की समस्या पैदा हो सकती है।
हालांकि इस तर्क के बावजूद सुनवाई का मुख्य मुद्दा सार्वजनिक भूमि और रास्तों पर निर्माण की वैधता बना रहा। यानी किसी निर्माण का उपयोग करने वाले व्यक्ति की पेशेवर पहचान से उसके भूमि अधिकार की कानूनी स्थिति अलग रहेगी।
लखनऊ कचहरी के आसपास अतिक्रमण हटाने का मामला पहले भी विवाद का कारण बन चुका है। मई में नगर निगम और पुलिस प्रशासन की संयुक्त टीम कार्रवाई के लिए पहुंची थी।
उस दौरान स्वास्थ्य भवन चौराहा, सदर तहसील और जिला अदालत के आसपास बड़ी संख्या में अवैध कब्जों और अस्थायी चैंबरों को हटाने की तैयारी की गई थी। कार्रवाई के दौरान अधिवक्ताओं और पुलिस के बीच तनाव की स्थिति बनी थी।
विरोध बढ़ने पर अधिवक्ताओं ने प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन किया था। कलेक्ट्रेट और जिलाधिकारी कार्यालय का घेराव भी किया गया था। स्थिति बिगड़ने के बाद पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा था।
मई में हुई कार्रवाई के दौरान अधिवक्ताओं की ओर से आरोप लगाया गया था कि नगर निगम ने पर्याप्त नोटिस दिए बिना कार्रवाई शुरू की। यह आरोप भी लगाया गया था कि चिन्हित निर्माणों से अधिक ढांचों पर कार्रवाई का प्रयास किया गया।
उस समय प्रशासन की कार्रवाई और अधिवक्ताओं के विरोध के बीच विवाद बढ़ा था। अब सुप्रीम कोर्ट में याचिका खारिज होने के बाद प्रशासन के पास हाईकोर्ट के निर्देशों के तहत आगे बढ़ने की स्थिति बन गई है।
हाईकोर्ट ने कार्रवाई के समय को लेकर यह सुझाव दिया था कि रविवार या अदालती अवकाश का दिन चुना जा सकता है। इसका उद्देश्य अदालत के सामान्य कामकाज पर संभावित असर को कम करना और वादकारियों को होने वाली परेशानी से बचाना था।
संभावित कार्रवाई के दौरान बड़ी संख्या में पुलिस बल और प्रांतीय सशस्त्र बल की तैनाती की संभावना बताई गई है। प्रशासन के लिए कार्रवाई के साथ कानून-व्यवस्था बनाए रखना भी महत्वपूर्ण होगा।
सुप्रीम कोर्ट से याचिका खारिज होने के बाद अब अगला कदम जिला प्रशासन, लखनऊ नगर निगम और संबंधित विभागों की ओर से उठाया जाना है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्रक्रिया में मुख्य रूप से इन बिंदुओं पर काम होना है:
- करीब 72 चिन्हित निर्माणों की मौके पर दोबारा पुष्टि।
- संबंधित जमीन पर वैध स्वामित्व या कानूनी अधिकार वाले निर्माणों की पहचान।
- जिन निर्माणों के संबंध में वैध अधिकार साबित नहीं होता, उनके खिलाफ निर्धारित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई।
- कार्रवाई के दौरान पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करना।
इस पूरी प्रक्रिया का आधार हाईकोर्ट के निर्देश और संबंधित निर्माणों की कानूनी स्थिति की जांच होगी।
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