लखनऊ इन दिनों सिर्फ नवाबी तहजीब के शहर की तरह नहीं, एक ऐसे शहर की तरह दिखाई दे रहा है जहां हर बाजार अपनी अलग कहानी कह रहा है। कहीं दुकान के सामने रंग-बिरंगी राखियों की कतारें हैं, कहीं बच्चे अपने पसंदीदा कार्टून वाली राखी के लिए जिद कर रहे हैं, तो कहीं बहनें दुकानदार से एक के बाद एक डिजाइन निकलवाकर देख रही हैं—“कुछ और दिखाइए, भाई के लिए थोड़ी अलग चाहिए।”
रक्षाबंधन करीब आते ही राजधानी की बाजार संस्कृति में भी त्योहार का रंग उतर आया है। चौक की पुरानी गलियों से अहियागंज के थोक बाजार तक, भूतनाथ और इंदिरानगर से चिनहट तक और गोमतीनगर के पत्रकारपुरम से आसपास के बाजारों तक राखी की खरीदारी ने बाजार की रफ्तार बढ़ा दी है।
शाम ढलते ही बाजारों की तस्वीर और बदल जाती है। दिनभर की गर्मी के बाद जैसे ही लोग खरीदारी के लिए निकलते हैं, राखी की दुकानों के सामने भीड़ बढ़ने लगती है। रंगों और डिजाइन से सजे काउंटर, दुकानों के बाहर लटकी राखियों की लड़ियां और हाथ में थैले लिए परिवार—इन सबके बीच लखनऊ इस समय रक्षाबंधन की तैयारी में दिखाई दे रहा है।
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इस बार बाजार की एक खास तस्वीर यह है कि राखी अब केवल एक धागा नहीं रह गई है। उसके साथ डिजाइन, पसंद, उम्र और बजट के मुताबिक विकल्पों की पूरी दुनिया बाजार में मौजूद है।
लखनऊ के पुराने बाजारों की बात हो और चौक का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं। त्योहारों के मौसम में चौक की संकरी गलियां और पुरानी बाजार संस्कृति अपनी अलग पहचान के साथ सामने आती हैं। रक्षाबंधन से पहले यहां भी राखियों की दुकानें और अस्थायी काउंटर रंगीन हो गए हैं।
जहां एक ओर पारंपरिक राखियों की मांग बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर नई डिजाइन वाली राखियां भी दुकानों पर नजर आ रही हैं। मोती, धागे और सजावटी काम वाली राखियों के साथ फैंसी डिजाइन ने बाजार में जगह बनाई है।
चौक की खासियत यह है कि यहां त्योहार की खरीदारी सिर्फ एक सामान खरीद लेने तक सीमित नहीं रहती। लोग आसपास की दुकानों से मिठाई, उपहार और दूसरी जरूरत की चीजें भी लेते हैं। इसलिए राखी की खरीदारी पूरे बाजार को
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अगर लखनऊ के राखी बाजार को समझना है तो अहियागंज की हलचल को देखना जरूरी है। राजधानी के प्रमुख थोक बाजारों में शामिल अहियागंज में त्योहार से पहले राखियों की बड़ी रेंज देखने को मिल रही है।
यहां खुदरा दुकानदार अलग-अलग डिजाइन और मूल्य वर्ग की राखियां खरीदने पहुंचते हैं। एक ही दुकान पर दर्जनों नहीं, बल्कि सैकड़ों तरह के डिजाइन नजर आ जाते हैं। साधारण राखियों के साथ बच्चों के लिए कार्टून डिजाइन, फैंसी राखियां, सजावटी राखियां और पैकिंग वाली राखियां भी थोक बाजार का हिस्सा हैं।
यहीं से राखियों की बड़ी खेप लखनऊ के दूसरे इलाकों के बाजारों तक पहुंचती है। इस लिहाज से अहियागंज केवल एक बाजार नहीं, बल्कि शहर के कई फुटकर राखी बाजारों के पीछे काम करने वाली थोक कड़ी के रूप में दिखाई देता है।
इंदिरानगर का भूतनाथ बाजार त्योहारों के दौरान हमेशा से खरीदारों की आवाजाही के लिए जाना जाता है। रक्षाबंधन से पहले यहां भी राखी की दुकानों पर चहल-पहल बढ़ गई है।
शाम के समय दुकानों के आगे परिवारों की मौजूदगी बढ़ती दिखाई देती है। महिलाएं अलग-अलग डिजाइन देख रही हैं और कई जगह बच्चे अपनी पसंद की राखी चुनने में सबसे ज्यादा उत्साहित नजर आते हैं।
दुकानों पर राखियों को इस तरह सजाया गया है कि पहली नजर में ही अलग-अलग मूल्य और डिजाइन समझ में आ जाएं। एक तरफ कम कीमत वाली सामान्य राखियां हैं तो दूसरी तरफ अधिक सजावटी और डिजाइनर विकल्प रखे गए हैं।
भूतनाथ की बाजार तस्वीर में त्योहार की खरीदारी का पारिवारिक रूप साफ दिखाई देता है—राखी के साथ मिठाई, उपहार और कपड़ों की खरीदारी भी इसी दौरान पूरी की जा रही है।
लखनऊ के तेजी से विकसित होते इलाकों में शामिल चिनहट और उसके आसपास के बाजारों में भी रक्षाबंधन की तैयारी दिखाई दे रही है। यहां स्थानीय बाजारों में राखी और त्योहार से संबंधित सामान की दुकानों पर खरीदार पहुंच रहे हैं।
चिनहट के बाजारों की अपनी खासियत है। यहां पुराने और नए लखनऊ की बाजार संस्कृति साथ-साथ दिखाई देती है। आसपास की कॉलोनियों और आवासीय इलाकों से आने वाले परिवार त्योहार की खरीदारी के लिए स्थानीय बाजारों का रुख कर रहे हैं।
राखी के साथ मिठाई और उपहार खरीदने की वजह से खरीदारी एक ही दुकान तक सीमित नहीं रहती। यही वजह है कि त्योहार से पहले बाजार के कई कारोबारी वर्गों में गतिविधि बढ़ती दिखाई दे रही है।
गोमतीनगर का पत्रकारपुरम रक्षाबंधन से पहले अलग रंग में दिखाई दे रहा है। राखी की दुकानों के साथ कपड़ों, उपहार और मिठाई की दुकानों पर भी खरीदारों की मौजूदगी बढ़ी है।
यहां आने वाले कई ग्राहक राखी के साथ भाई के लिए उपहार भी तलाश रहे हैं। कुछ के लिए प्राथमिकता राखी है, तो कुछ लोग भाई की पसंद के अनुसार राखी और उपहार दोनों चुन रहे हैं।
पत्रकारपुरम के बाजार में आधुनिक डिजाइन और आकर्षक पैकिंग वाली राखियों की मौजूदगी भी अधिक दिखाई देती है। युवाओं और बच्चों के लिए अलग-अलग विकल्प काउंटर पर सामने रखे गए हैं।
गोमतीनगर के दूसरे हिस्सों में भी त्योहार से पहले खरीदारी का माहौल दिखाई दे रहा है। यहां पारंपरिक दुकानों के साथ आधुनिक खुदरा बाजार और उपहार केंद्र भी रक्षाबंधन की खरीदारी का हिस्सा बन रहे हैं।
बाजार में मौजूद राखियों को देखकर साफ समझ आता है कि ग्राहक अब केवल कीमत के आधार पर चुनाव नहीं कर रहा। डिजाइन, रंग, पैकिंग और भाई की पसंद भी खरीदारी का हिस्सा बन गए हैं। इसी वजह से एक ही बाजार में 10 रुपये की सामान्य राखी से लेकर करीब 300 रुपये तक की विशेष राखियां मौजूद हैं।
राखी बाजार की सबसे दिलचस्प बात इसकी कीमतों की विविधता है। सामान्य राखियां करीब 10 रुपये से शुरू होती हैं और कुछ विशेष डिजाइन की राखियां 300 रुपये तक उपलब्ध हैं।
कम कीमत की राखियां उन ग्राहकों के लिए विकल्प देती हैं जो पारंपरिक धागे और सामान्य डिजाइन पसंद करते हैं। दूसरी ओर, फैंसी और अधिक सजावटी राखियों की अपनी मांग है।
दुकानदारों ने अलग-अलग बजट को ध्यान में रखते हुए काउंटर तैयार किए हैं। यही कारण है कि ग्राहक एक ही जगह पर अपनी पसंद और बजट के मुताबिक कई विकल्प देख पा रहे हैं।
राखी खरीदने का उत्साह सबसे ज्यादा बच्चों के बीच दिखाई देता है। बाजार में उनके लिए अलग डिजाइन वाली राखियां रखी गई हैं। कार्टून पात्रों वाली राखियां, चमकीले रंगों की राखियां और आकर्षक पैकिंग बच्चों को अपनी ओर खींच रही हैं। कई बच्चे दुकान पर पहुंचते ही सबसे पहले इसी हिस्से की ओर जाते हैं।
बच्चों की पसंद को ध्यान में रखते हुए दुकानदारों ने छोटी उम्र के खरीदारों के लिए अलग रेंज रखी है। कुछ राखियों की पैकिंग भी इतनी आकर्षक है कि वह राखी के साथ छोटे उपहार जैसी दिखाई देती है।
बाजार में पारंपरिक राखियों की जगह बनी हुई है, लेकिन इनके साथ आधुनिक विकल्प भी बढ़े हैं। फैंसी डिजाइन, लाइट वाली राखियां, सजावटी तत्वों वाली राखियां और संदेश वाली राखियां काउंटर पर दिखाई दे रही हैं।
राखी के डिजाइन में यह विविधता ग्राहक को एक ही श्रेणी में कई विकल्प देती है। भाई की उम्र, पसंद और व्यक्तित्व के हिसाब से राखी चुनने की कोशिश बाजार में साफ नजर आती है। युवाओं के लिए जहां अपेक्षाकृत सादे और आधुनिक डिजाइन मौजूद हैं, वहीं बच्चों के लिए अधिक रंगीन और आकर्षक विकल्प रखे गए हैं।
बाजार में राखी खरीदने आई महिलाओं की बातचीत में सबसे आम बात भाई की पसंद को लेकर है। किसी को विशेष रंग चाहिए, किसी को नया डिजाइन पसंद आता है और कोई पारंपरिक राखी ही तलाश रही है।
कई खरीदार एक दुकान से दूसरी दुकान तक जाकर डिजाइन देख रहे हैं। एक राखी पसंद आने के बाद दूसरी दुकान पर उससे बेहतर विकल्प मिलने की उम्मीद भी खरीदारी का हिस्सा है।
राखी के साथ उपहार और मिठाई खरीदने का सिलसिला भी चल रहा है। यानी बहन के लिए यह सिर्फ एक धागा खरीदने का दिन नहीं, बल्कि भाई के लिए पूरे त्योहार की तैयारी का हिस्सा है।
लखनऊ के बाजारों में रक्षाबंधन की तैयारी को सिर्फ राखी की बिक्री के आंकड़े से नहीं देखा जा सकता। राखी की दुकान के आसपास मिठाई, कपड़े और उपहार की दुकानों पर भी ग्राहक दिखाई दे रहे हैं। कहीं भाई के लिए शर्ट या दूसरा उपहार चुना जा रहा है, कहीं मिठाई का डिब्बा लिया जा रहा है और कहीं राखी के साथ सजावटी पैकिंग की मांग है।
एक त्योहार से जुड़ी यह खरीदारी अलग-अलग बाजारों और कारोबारियों को एक साथ प्रभावित करती है। यही वजह है कि रक्षाबंधन के दिनों में बाजार का माहौल केवल राखी की दुकानों तक सीमित नहीं रहता।
रक्षाबंधन की खरीदारी के दौरान लखनऊ की बाजार संस्कृति की दो तस्वीरें एक साथ दिखाई देती हैं। एक तरफ चौक और अहियागंज जैसे पुराने बाजार हैं, जहां त्योहार और बाजार की पारंपरिक पहचान अब भी मजबूत है। दूसरी ओर गोमतीनगर, पत्रकारपुरम, चिनहट और इंदिरानगर जैसे इलाके हैं, जहां आधुनिक बाजार संस्कृति के बीच त्योहार की खरीदारी अपना नया रूप ले रही है।
राखी के डिजाइन में भी यही बदलाव दिखाई देता है। पुराने धागे और मोती अब भी काउंटर पर हैं, लेकिन उनके साथ कार्टून, फैंसी डिजाइन, रोशनी और आकर्षक पैकिंग ने भी जगह बना ली है।
त्योहार जैसे-जैसे करीब आ रहा है, लखनऊ के बाजारों में खरीदारों की संख्या बढ़ रही है। शाम के समय यह हलचल ज्यादा स्पष्ट नजर आती है। अहियागंज के थोक बाजार में दुकानदारों की गतिविधि और शहर के फुटकर बाजारों में ग्राहकों की भीड़—दोनों एक ही त्योहार की अलग-अलग तस्वीर पेश करते हैं।
भूतनाथ में परिवारों की खरीदारी, चिनहट में स्थानीय बाजारों की रौनक, पत्रकारपुरम में राखी और उपहार की खरीदारी, गोमतीनगर में आधुनिक डिजाइन और चौक में परंपरागत बाजार संस्कृति—इन सभी तस्वीरों को जोड़ें तो लखनऊ में रक्षाबंधन का बाजार एक बड़े उत्सव की तरह सामने आता है।
शायद वह एक दृश्य—दुकान के सामने खड़ी बहन, हाथ में राखियों की कई कतारें और आंखों में लगातार यही तलाश कि इनमें से कौन-सी राखी भाई की कलाई पर सबसे अच्छी लगेगी।
चौक की पुरानी गलियों से लेकर गोमतीनगर की चौड़ी सड़कों तक और अहियागंज के थोक बाजार से लेकर चिनहट के स्थानीय बाजारों तक, रक्षाबंधन ने लखनऊ की रोजमर्रा की रफ्तार में त्योहार का रंग घोल दिया है।
कहीं दस रुपये की राखी खरीदी जा रही है, कहीं तीन सौ रुपये वाली पसंद की जा रही है। किसी के लिए कार्टून वाली राखी जरूरी है, किसी को पारंपरिक धागा चाहिए। डिजाइन अलग हैं, बाजार अलग हैं, बजट अलग हैं—लेकिन खरीदारी के पीछे भावना एक ही है। भाई की कलाई पर बांधने के लिए ऐसी राखी तलाशना, जिसे देखते ही लगे—यह मेरे भाई के लिए ही है।
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