प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 मई 2026 को हैदराबाद में आयोजित एक रैली के दौरान देशवासियों से एक ऐसी अपील की, जिसने आर्थिक और राजनीतिक दोनों हलकों में चर्चा शुरू कर दी है। प्रधानमंत्री ने लोगों से अगले एक साल तक सोने की खरीदारी से बचने की अपील करते हुए इसे देशहित से जोड़कर पेश किया। उन्होंने कहा कि देशभक्ति केवल सीमा पर जान देने तक सीमित नहीं है, बल्कि कठिन आर्थिक परिस्थितियों में जिम्मेदारी से व्यवहार करना भी राष्ट्रहित का हिस्सा है।
प्रधानमंत्री की यह अपील ऐसे समय में आई है जब वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितता बढ़ी हुई है। ईरान के साथ जारी तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और रुपये पर बढ़ते दबाव के बीच भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर असर दिखाई दे रहा है। ऐसे माहौल में सरकार की चिंता मुख्य रूप से डॉलर के बढ़ते ऑउटफ्लो को लेकर मानी जा रही है।
ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के आंकड़ों के अनुसार भारत का विदेशी मुद्रा भंडार फिलहाल लगभग 690.69 अरब डॉलर है। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि फरवरी 2026 में यह भंडार 728 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, लेकिन ग्लोबल मार्किट में अस्थिरता और इम्पोर्ट लागत बढ़ने के कारण अप्रैल तक इसमें उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। दूसरी ओर आईएमएफ का अनुमान है कि वर्ष 2026 में भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़कर 84.5 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, जो देश की जीडीपी का करीब 2 प्रतिशत होगा।
आर्थिक विशेषज्ञों के मुताबिक करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ने का मतलब यह है कि भारत से बाहर जाने वाले डॉलर की मात्रा देश में आने वाले डॉलर से अधिक हो रही है। इसमें कच्चे तेल और सोने का इम्पोर्ट बड़ी भूमिका निभाता है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना उपभोक्ता देश है। देश में हर साल लगभग 700 से 800 टन सोने की मांग रहती है, जबकि घरेलू उत्पादन केवल 1 से 2 टन तक सीमित है। ऐसे में भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत सोना विदेशों से आयात करता है।
वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान भारत का गोल्ड इम्पोर्ट बढ़कर 72 अरब डॉलर तक पहुंच गया। पिछले वित्तीय वर्ष में यह आंकड़ा करीब 58 अरब डॉलर था। यानी एक साल में गोल्ड इम्पोर्ट बिल में लगभग 24 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। चूंकि सोने का भुगतान अमेरिकी डॉलर में किया जाता है, इसलिए इसका सीधा दबाव विदेशी मुद्रा भंडार और रुपये की स्थिति पर पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि देश में एक साल तक सोने की खरीदारी में कमी आती है तो भारत को विदेशी मुद्रा बचाने में बड़ी राहत मिल सकती है। अनुमान के अनुसार यदि गोल्ड इम्पोर्ट में 30 से 40 प्रतिशत तक कमी आती है तो 20 से 25 अरब डॉलर तक की बचत संभव है। वहीं अगर इम्पोर्ट में 50 प्रतिशत की गिरावट आती है तो करीब 36 अरब डॉलर तक की विदेशी मुद्रा बचाई जा सकती है। यह राशि देश के अनुमानित करंट अकाउंट डेफिसिट के लगभग आधे हिस्से के बराबर मानी जा रही है।
प्रधानमंत्री मोदी की अपील को कई अर्थशास्त्री एक प्रतीकात्मक आर्थिक संदेश के रूप में भी देख रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार जनता के सहयोग से गैर-जरूरी इम्पोर्ट पर निर्भरता कम करना चाहती है ताकि वैश्विक आर्थिक दबावों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थिर रखा जा सके। हालांकि बाजार विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत में सोना केवल निवेश का माध्यम नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा का भी हिस्सा है, इसलिए इस अपील का वास्तविक असर आने वाले महीनों में मांग के आंकड़ों से स्पष्ट होगा।
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