लखनऊ - उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने एक बार फिर कड़े एक्शन का उदाहरण पेश किया है। होम्योपैथी विभाग के निदेशक प्रो. अरविंद कुमार वर्मा को गंभीर आरोपों के चलते तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। उन पर ट्रांसफर-पोस्टिंग में भारी अनियमितता, कर्तव्य में लापरवाही और भ्रामक जानकारी देने जैसे आरोप लगे हैं। इस कार्रवाई से प्रदेश के चिकित्सा और प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है।
निलंबन की कार्रवाई आयुष मंत्री दयाशंकर मिश्र 'दयालु' के निर्देश पर की गई है। आयुष अनुभाग-2 के प्रमुख सचिव रंजन कुमार द्वारा हस्ताक्षरित आदेश में कहा गया है कि प्रो. वर्मा की कार्यप्रणाली संदिग्ध, शिथिल और असंवेदनशील रही है। इसलिए उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है और अब वह गाजीपुर के राजकीय होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल से संबद्ध रहेंगे।
किस बात पर गिरी कार्रवाई की गाज?
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ट्रांसफर और पोस्टिंग प्रक्रिया में अनियमितता
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पदस्थापना के दायित्वों में लापरवाही
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भ्रामक तथ्यों के माध्यम से शासन को गुमराह करना
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कार्यप्रणाली में शिथिलता और संवेदनहीनता
प्रो. वर्मा के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली 1999 के तहत विभागीय जांच शुरू कर दी गई है। इससे पहले भी कई विभागों में ऐसे ही मामलों पर योगी सरकार ने ज़ीरो टॉलरेंस की नीति के तहत सख्त कदम उठाए हैं।
निलंबन में कितनी मिलेगी सैलरी?
सरकार द्वारा जारी पत्र के अनुसार, प्रो. वर्मा को आधा वेतन और उसी के अनुरूप जीवन निर्वाह भत्ता मिलेगा। यदि वे पहले से मंहगाई भत्ते के पात्र नहीं थे तो निलंबन काल में उन्हें यह भत्ता भी नहीं मिलेगा। अन्य भत्तों की पात्रता भी खर्च की पुष्टि पर निर्भर होगी।
पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले
यह पहला मौका नहीं है जब ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर किसी वरिष्ठ अधिकारी पर कार्रवाई हुई हो। इससे पहले रजिस्ट्री विभाग में भी इसी तरह के मामलों में कई तबादले रोके गए थे और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की गई थी।
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