>उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव से पहले पंचायती राज विभाग का एक आदेश जमकर सुर्खियों में आ गया। आदेश में ग्राम प्रधानों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने को लेकर नई शर्त रखी गई थी, जिसने राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी। मामला तूल पकड़ने पर विभाग ने आदेश को तत्काल रद्द कर दिया।
>31 जुलाई को पंचायती राज विभाग की ओर से जारी आदेश में कहा गया कि ग्राम प्रधानों के खिलाफ शिकायत केवल वही व्यक्ति कर सकता है, जो संबंधित ग्राम पंचायत का निवासी हो। यानी बाहरी व्यक्ति या संगठन प्रधान की कार्यशैली और भ्रष्टाचार को लेकर शिकायत दर्ज नहीं करा सकते थे। इस आदेश के सामने आते ही विभागीय महकमे से लेकर राजनीतिक हलकों तक बवाल मच गया। इसके बाद विभाग ने आदेश वापस लेते हुए साफ किया कि ग्राम प्रधानों के खिलाफ कोई भी नागरिक सरकार या जिलाधिकारी से शिकायत दर्ज करा सकता है।
>यह आदेश उत्तर प्रदेश पंचायती राज विभाग जांच नियमावली 1997 के प्रावधानों के विपरीत था। नियमावली में कहीं भी ऐसा प्रतिबंध नहीं है कि केवल ग्राम पंचायत का निवासी ही शिकायत दर्ज कर सके। आदेश जारी करने वाले अधिकारी एसएन सिंह को निलंबित कर दिया गया। इससे पहले भी विभाग विवादित आदेशों के चलते चर्चा में रहा है। कुछ माह पहले यादव और मुसलमानों के अवैध कब्जों की जांच कराने का आदेश वायरल हुआ था, जिस पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सख्ती दिखाई थी और विभागीय स्तर पर कार्रवाई की गई थी।
>पंचायत चुनाव से पहले ओपी राजभर के नेतृत्व वाले पंचायती राज विभाग का यह आदेश राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया। विपक्ष ने सरकार पर पंचायत चुनाव प्रभावित करने के आरोप लगाए, वहीं सरकार ने मामले की गंभीरता देखते हुए तत्काल आदेश वापस लेकर नुकसान नियंत्रण की कोशिश की।
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