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250 करोड़ की ठगी, मोटी सैलरी और फिर जेल... पहली रात गर्मी में करवटें बदलते रहे आरोपी

लखनऊ के फर्जी कॉल सेंटर से जुड़े 119 आरोपियों की जिला जेल में पहली रात मुश्किलों में गुजरी, जांच में अमेरिकी नागरिकों को एफबीआई अधिकारी बनकर ठगने वाले नेटवर्क का खुलासा
Bureau
Bureau News Desk
04 Jul 2026
08:04 PM
1 min read
250 करोड़ की ठगी, मोटी सैलरी और फिर जेल... पहली रात गर्मी में करवटें बदलते रहे आरोपी
हाइलाइट्स
लखनऊ के फर्जी कॉल सेंटर मामले में गिरफ्तार 119 आरोपियों की पहली रात जिला जेल में कठिन परिस्थितियों में बीती।
पुलिस के अनुसार, गिरोह वॉइप तकनीक के जरिए खुद को एफबीआई अधिकारी बताकर अमेरिकी नागरिकों से साइबर ठगी करता था।
प्रारंभिक जांच में करीब 250 करोड़ रुपये की साइबर ठगी का खुलासा हुआ है।
जांच के मुताबिक, कॉल सेंटर में काम करने वाले टेली कॉलर्स को 30 से 40 हजार रुपये मासिक वेतन दिया जाता था।

लखनऊ। 30 से 40 हजार रुपये महीने की नौकरी, एयर कंडीशनर वाले दफ्तर में काम और विदेशी ग्राहकों से बातचीत। लेकिन कुछ ही घंटों में यही नौकरी 119 युवक-युवतियों को जिला जेल की बैरकों तक ले आई। लखनऊ के चर्चित फर्जी कॉल सेंटर मामले में गिरफ्तार आरोपियों की पहली रात जेल में बेचैनी के बीच गुजरी। जेल सूत्रों के अनुसार, एसी में काम करने के आदी कई आरोपी भीषण गर्मी के कारण रातभर ठीक से सो नहीं सके और बैरकों में करवटें बदलते रहे।

सूत्रों के मुताबिक, कई आरोपियों ने जेल का खाना भी बेमन से खाया। कुछ आरोपी आपस में यह कहते सुने गए कि अधिक वेतन के लालच में स्वीकार की गई नौकरी उन्हें जेल तक पहुंचा देगी, इसका उन्होंने कभी अनुमान नहीं लगाया था। वहीं अधिकांश आरोपी अपने भविष्य और परिवार की प्रतिष्ठा को लेकर चिंतित दिखाई दिए।

यह मामला लखनऊ की समिट बिल्डिंग में संचालित एक कथित फर्जी कॉल सेंटर से जुड़ा है। पुलिस के अनुसार, 'सोलेरिस सॉल्यूशन' नाम से संचालित इस कॉल सेंटर के जरिए अमेरिका के नागरिकों को निशाना बनाया जाता था। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि जनवरी 2025 से सक्रिय इस नेटवर्क ने करीब 250 करोड़ रुपये की साइबर ठगी को अंजाम दिया। इस मामले में विभूतिखंड थाने में मुकदमा दर्ज किया गया है और गिरफ्तार सभी आरोपियों से पूछताछ जारी है।

जांच के अनुसार, गिरोह इंटरनेट आधारित तकनीक का इस्तेमाल करता था। अमेरिका में मौजूद सहयोगियों द्वारा कंपनियों के टोल-फ्री नंबरों की कथित डुप्लीकेट व्यवस्था तैयार की गई थी। जब कोई अमेरिकी नागरिक उन नंबरों पर संपर्क करता था तो कॉल लखनऊ स्थित कॉल सेंटर तक पहुंच जाती थी।

इसके बाद प्रशिक्षित टेली कॉलर्स खुद को एफबीआई अधिकारी बताकर बातचीत शुरू करते थे। पुलिस के मुताबिक, लोगों को पोर्नोग्राफी या अन्य मामलों में कानूनी कार्रवाई और गिरफ्तारी का डर दिखाकर उनसे धनराशि वसूली जाती थी। जांच में यह भी सामने आया है कि गिरोह विशेष रूप से बुजुर्गों और विदेशी महिलाओं को निशाना बनाता था।

डीसीपी क्राइम अनिल यादव के अनुसार, कॉल सेंटर में काम करने वाले टेली कॉलर्स को 30 से 40 हजार रुपये तक मासिक वेतन दिया जाता था। विदेशी नागरिकों से बातचीत के लिए अंग्रेजी भाषा का ज्ञान अनिवार्य था और कर्मचारियों को कॉल करने के तरीके, बातचीत की स्क्रिप्ट तथा लोगों का विश्वास जीतने के लिए विशेष प्रशिक्षण भी दिया जाता था। पुलिस का कहना है कि मामले की जांच के दौरान अमेरिका में मौजूद गिरोह के अन्य सहयोगियों की भूमिका भी सामने आई है, जिसकी पड़ताल की जा रही है।

पुलिस ने मंगलवार रात कॉल सेंटर पर छापा मारकर कार्रवाई शुरू की, जो बुधवार शाम तक चली। कार्रवाई के दौरान कई महिला कर्मचारी भावुक होकर रोने लगीं, जिसके बाद अतिरिक्त महिला पुलिस बल बुलाया गया।

पूछताछ के दौरान ऑपरेशन मैनेजर ललित खैराजानी और विक्रम सिंह परमार से भी पूछताछ की गई। पुलिस का कहना है कि दोनों से मिली जानकारी के आधार पर गिरोह के अन्य प्रमुख सदस्यों की तलाश जारी है।

वरिष्ठ जेल अधीक्षक राजेंद्र जायसवाल ने बताया कि सभी आरोपियों का मेडिकल परीक्षण कराया गया है। शुक्रवार को आरोपियों से मिलने उनके परिवार का कोई सदस्य जेल नहीं पहुंचा। सभी को नियमानुसार जेल में रखा गया है।

पुलिस ने कॉल सेंटर से बरामद कंप्यूटर, मोबाइल फोन, सर्वर और अन्य डिजिटल उपकरण जब्त किए हैं। अधिकारियों के अनुसार, इनकी फोरेंसिक जांच कराई जाएगी ताकि साइबर ठगी के पूरे नेटवर्क, धन के प्रवाह और विदेश में मौजूद सहयोगियों की भूमिका का पता लगाया जा सके। मामले की जांच जारी है।

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