नई दिल्ली। 1995 में एम्स के पास कारोबारी ऋषि सेठी के अपहरण मामले में उम्रकैद की सजा पाने के बाद फरार चल रहे अमित यादव को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने देहरादून से गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक वह वर्ष 2000 में अंतरिम जमानत मिलने के बाद फरार हो गया था और करीब 26 साल तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर रहा।
क्राइम ब्रांच के अनुसार, लंबे समय तक फरार रहने के दौरान अमित यादव ने अपना ठिकाना बदला और अपनी पहचान भी बदल ली। वह देहरादून में निर्माण कारोबार से जुड़ गया था। उसकी पहचान तक पहुंचने में 1999 में रिकॉर्ड किए गए बायोमेट्रिक और फिंगरप्रिंट डाटा ने अहम भूमिका निभाई।
मामला 12 सितंबर 1995 का है। पुलिस के मुताबिक उस दिन कारोबारी ऋषि सेठी एम्स के निदेशक के आवास के पास अपनी कार में बैठे थे। इसी दौरान चार बदमाशों ने उन्हें गन प्वाइंट पर अगवा कर लिया। अपहरण के दौरान उनके साथ मारपीट की गई और आंखों पर पट्टी बांधकर उन्हें उनकी ही कार में ले जाया गया। इसके बाद बदमाशों ने ऋषि सेठी के परिवार से एक करोड़ रुपये की फिरौती की मांग की। पुलिस के मुताबिक, फिरौती के लिए हुई बातचीत के बाद 10 लाख रुपये की रकम देने पर सहमति बनी। यह रकम मेरठ के होटल मयूर के कमरा नंबर 221 में पहुंचाई जानी थी।
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16 सितंबर 1995 को अमित यादव फिरौती की रकम लेने मेरठ के होटल पहुंचा। पुलिस ने उसे वहीं गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद उसकी निशानदेही पर गाजियाबाद के राज नगर स्थित उसके किराये के मकान पर छापा मारा गया। पुलिस के मुताबिक, इसी मकान से ऋषि सेठी को मुक्त कराया गया। उन्हें एक स्टोर रूम के भीतर जंजीरों से बांधकर रखा गया था। छापेमारी के दौरान पुलिस ने ताले, चाबियां, पट्टियां और अन्य सामान भी बरामद किया था। ये वस्तुएं मामले की जांच में अहम साक्ष्य के तौर पर दर्ज की गई थीं।
मामले की सुनवाई के बाद पटियाला हाउस कोर्ट ने 25 अगस्त 1999 को अमित यादव को दोषी ठहराया। अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा के साथ 2.50 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। इसके बाद मामले में अपील की गई, लेकिन दिसंबर 2000 में दिल्ली हाई कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए सजा बरकरार रखी। इसी अवधि में अमित यादव को एक महीने की अंतरिम जमानत मिली थी। पुलिस के मुताबिक, इसी दौरान वह फरार हो गया और इसके बाद करीब 26 साल तक उसका पता नहीं चल सका।
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लंबे समय तक फरार रहने के कारण आरोपी की तलाश पुलिस के लिए चुनौती बन गई थी। क्राइम ब्रांच के मुताबिक, इतने वर्षों के दौरान जेल प्रशासन के पास उसकी कोई तस्वीर उपलब्ध नहीं थी और दिल्ली पुलिस के रिकॉर्ड में भी उसकी पुरानी तस्वीर नहीं मिल रही थी। ऐसे में जांच टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसकी पहचान की पुष्टि करना थी। कई साल पुराने मामले में उपलब्ध रिकॉर्ड को फिर से खंगाला गया और उसके पुराने बायोमेट्रिक रिकॉर्ड तक पहुंच बनाई गई।
क्राइम ब्रांच के मुताबिक, मामले की जांच में फिंगरप्रिंट ब्यूरो और क्राइम रिकॉर्ड ऑफिस की मदद ली गई। टीम ने 1999 में सजा के समय रिकॉर्ड किए गए अमित यादव के बायोमेट्रिक और फिंगरप्रिंट डाटा को खोज निकाला। यही रिकॉर्ड आगे चलकर उसकी पहचान की पुष्टि का आधार बना। पुलिस ने पुराने फिंगरप्रिंट डाटा को वर्तमान जानकारी से मिलाकर उसकी पहचान सुनिश्चित की और उसकी तलाश देहरादून तक पहुंची। क्राइम ब्रांच के मुताबिक, फिंगरप्रिंट ब्यूरो के निदेशक सुभाष चंदर और क्राइम रिकॉर्ड ऑफिस के इंस्पेक्टर ब्रह्म प्रकाश की भूमिका इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण रही।
पूछताछ में अमित यादव ने पुलिस को बताया कि वर्ष 2000 में फरार होने के बाद उसने गाजियाबाद का मकान छोड़ दिया। इसके साथ ही उसने दिल्ली पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज अपने संपर्कों को भी खत्म कर दिया। पुलिस के अनुसार, उसने बागपत के सैदपुर गांव में स्थित अपनी पैतृक जमीन-जायदाद भी बेच दी थी। इसके बाद वह शुरुआती दौर में ऋषिकेश में अलग-अलग ठिकानों पर रहकर छिपा रहा। वर्ष 2001 में वह देहरादून चला गया।
पुलिस के मुताबिक, देहरादून पहुंचने के बाद अमित यादव ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर अपनी पहचान बदल ली। इसके बाद उसने निर्माण कारोबार शुरू किया। जांच के अनुसार, लंबे समय तक वह देहरादून में इसी पहचान के साथ रह रहा था और निर्माण क्षेत्र में कारोबार कर रहा था। पुलिस का कहना है कि गिरफ्तारी से पहले तक उसकी पहचान पुराने आपराधिक मामले से जुड़ नहीं पाई थी। क्राइम ब्रांच की टीम ने कई महीनों तक जांच और रिकॉर्ड की पड़ताल करने के बाद उसे देहरादून से गिरफ्तार किया।
अमित यादव की गिरफ्तारी के लिए चलाए गए अभियान का नेतृत्व डीसीपी संजीव कुमार यादव के नेतृत्व में की गई टीम ने किया। इसमें एसीपी संजय नागपाल और इंस्पेक्टर रोबिन त्यागी शामिल थे। पुलिस के मुताबिक, पुराना रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने और आरोपी की पहचान बदल जाने के कारण जांच को आगे बढ़ाने में काफी समय लगा। पुराने फिंगरप्रिंट और बायोमेट्रिक डेटा तक पहुंचने के बाद जांच को दिशा मिली।
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