>अयोध्या का दीपोत्सव अब केवल भक्ति और आस्था का उत्सव नहीं रहा, बल्कि यह ग्रामोद्योग और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन चुका है। योगी सरकार की पहल से शुरू हुआ यह महाउत्सव अब हजारों कुम्हार परिवारों के लिए रोजगार और सम्मान की नई रोशनी लेकर आया है।
>इस वर्ष नवां दीपोत्सव 2025 ऐतिहासिक बनने जा रहा है अयोध्या में 26 लाख 11 हजार 101 दीप जलाने की तैयारी चल रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर प्रशासन, अवध विश्वविद्यालय के छात्र और स्थानीय संगठन इस आयोजन को नए रिकॉर्ड की ओर ले जाने में जुटे हैं।
>दीपोत्सव की शुरुआत के बाद से अयोध्या और आसपास के गांवों के कुम्हार परिवारों की ज़िंदगी में बड़ा बदलाव आया है।
जयसिंहपुर गांव के कुम्हार बृज किशोर प्रजापति बताते हैं “पहले हम महीने में मुश्किल से 20–25 हजार रुपये कमा पाते थे। अब दीपोत्सव के दौरान लाखों रुपये की आमदनी हो जाती है। इस बार हमें दो लाख दीयों का ऑर्डर मिला है।” उनका कहना है कि योगी सरकार की इस परंपरा ने न केवल हमारे हुनर को पहचान दी, बल्कि हमें आत्मनिर्भर भी बनाया।
>अब कुम्हार परंपरागत हाथ के चाक की जगह इलेक्ट्रिक चाक का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे उत्पादन क्षमता कई गुना बढ़ गई है और मिट्टी के दीयों की गुणवत्ता भी बेहतर हुई है। जयसिंहपुर, विद्याकुंड, सोहावल जैसे गांवों में कुम्हार दिन-रात दीए बनाने में जुटे हैं। मिट्टी गूंथने से लेकर उन्हें आकार देने और सुखाने-बेचने तक पूरा परिवार इसमें भागीदारी निभा रहा है।
>2017 से पहले ये कुम्हार परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहे थे। लेकिन दीपोत्सव ने उनके जीवन में नई सुबह ला दी। सोहावल की पिंकी प्रजापति बताती हैं “पहले दीप सस्ते बिकते थे, अब सरकार के आह्वान पर मांग बढ़ गई है। इस बार मुझे एक लाख दीयों का ऑर्डर मिला है। हमारी मेहनत का सही मूल्य अब मिल रहा है।”
>मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दीपोत्सव में मिट्टी के दीयों को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया है। इस निर्णय ने स्थानीय कलाकारों के हुनर को राष्ट्रीय पहचान दिलाई है। अयोध्या के सैकड़ों कुम्हार परिवार अब न केवल स्थानीय बल्कि अन्य जिलों के लिए भी दीए सप्लाई कर रहे हैं।
| वर्ष | जले दीपों की संख्या |
|---|---|
| 2017 | 1.71 लाख |
| 2018 | 3.01 लाख |
| 2019 | 4.04 लाख |
| 2020 | 6.06 लाख |
| 2021 | 9.41 लाख |
| 2022 | 15.76 लाख |
| 2023 | 22.23 लाख |
| 2024 | 25.12 लाख |
| 2025 (लक्ष्य) | 26.11 लाख |
>हर वर्ष बढ़ती यह संख्या बताती है कि दीपोत्सव अब सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आर्थिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक बन चुका है।
>दीपोत्सव के जरिए कुम्हारों के घरों में रोशनी फैलाने वाली यह पहल ‘वोकल फॉर लोकल’ की मिसाल है। मिट्टी, संस्कृति और रोजगार तीनों के मेल से अयोध्या आज आत्मनिर्भर भारत की दिशा में चमकता उदाहरण बन गई है।
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