>कक्षा एक से आठवीं तक शिक्षक बने रहने के लिए टीईटी अनिवार्यता को लागू करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ प्रदेश सरकार ने पुनर्विचार याचिका दायर की है। इस फैसले से उत्तर प्रदेश के करीब 1.5 लाख और पूरे देश में लगभग दस लाख शिक्षक प्रभावित हो रहे हैं। यह वे शिक्षक हैं जिन्हें 23 अगस्त 2010 को राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीईटी) की अधिसूचना के तहत नियुक्त किया गया था, जिसमें पहले से नियुक्त शिक्षकों को टीईटी देने की आवश्यकता नहीं बताई गई थी।
>विशिष्ट बीटीसी शिक्षक वेलफेयर एसोसिएशन उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष संतोष तिवारी ने स्पष्ट किया कि इंटरनेट मीडिया में फैलाया जा रहा यह भ्रम कि 2017 में सभी शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य कर दिया गया, सही नहीं है। संशोधन केवल अप्रशिक्षित शिक्षकों को प्रशिक्षण पूरा करने की समय-सीमा बढ़ाने के लिए था।
>संयुक्त मोर्चा महासचिव दिलीप चौहान ने कहा कि कोर्ट का यह आदेश खेल के बीच में नियम बदलने जैसा है। वरिष्ठ उपाध्यक्ष शालिनी मिश्रा ने भी इसे त्रुटिपूर्ण करार दिया। संगठन के विधि विशेषज्ञ अरुण कुमार और विधि सलाहकार आमोद श्रीवास्तव ने कहा कि फैसले का पूर्वव्यापी प्रभाव नहीं होना चाहिए और सरकार को सुप्रीम कोर्ट में अपने पक्ष को स्पष्ट रखना चाहिए।
>प्रदेश महासचिव दिलीप चौहान और सचिव राकेश तिवारी ने कहा कि राज्य सरकार की रिव्यू पिटीशन का स्वागत किया जाता है और यदि केंद्र सरकार भी हस्तक्षेप करती है तो देशभर के शिक्षकों को सामूहिक राहत मिल सकती है। शिक्षक संगठनों का मानना है कि यह कदम हजारों शिक्षकों के भविष्य को सुरक्षित करेगा और रोजगार में असमर्थता से बचाएगा।
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