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1997 से कोर्ट में था नजूल भूमि विवाद, अब वादी ने पैरवी से किया किनारा

मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल की समीक्षा के बाद वादी ने न्यायालय में आगे पैरवी न करने का शपथ-पत्र दिया, प्रशासन अब जमीन सुरक्षित करेगा।
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Bureau News Desk
28 Sep 2026
03:22 PM
1 min read
1997 से कोर्ट में था नजूल भूमि विवाद, अब वादी ने पैरवी से किया किनारा
हाइलाइट्स
गोंडा में करीब 30 साल पुराना नजूल भूमि विवाद न्यायालय में लंबित था।
मामला नजूल भूखंड संख्या 514, 515, 524 और 525 से संबंधित है।
वर्ष 1997 में प्रकरण शुरू हुआ था और वर्ष 2008 में स्थगन आदेश पारित हुआ था।
वादी दयानन्द मिश्र ने न्यायालय में आगे पैरवी न करने का शपथ-पत्र दिया।

उत्तर प्रदेश के देवीपाटन मंडल में करीब तीन दशक से लंबित नजूल भूमि से जुड़े एक मामले की स्थिति हाल में बदली है। मामला गोंडा में मंडलायुक्त कार्यालय एवं भवन के लिए आरक्षित चार नजूल भूखंडों से जुड़ा है। लंबे समय से न्यायालय में चल रहे इस प्रकरण में अब संबंधित पक्ष की ओर से ऐसा कदम उठाया गया है, जिससे मामले की आगे की प्रक्रिया की दिशा बदल गई है।

प्रशासन के अनुसार, प्रकरण की दोबारा समीक्षा के दौरान न्यायालयीन रिकॉर्ड के साथ मौके की स्थिति की भी पड़ताल की गई। इसके बाद वादी दयानन्द मिश्र की ओर से न्यायालय में शपथ-पत्र प्रस्तुत किया गया, जिसमें आगे पैरवी न करने और कार्यवाही समाप्त किए जाने का अनुरोध किया गया है। संबंधित पक्ष ने मौके से अपना करीब 30 वर्ष पुराना कब्जा भी हटा लिया है।

यह प्रकरण गोंडा में मंडलायुक्त कार्यालय एवं भवन के लिए आरक्षित नजूल भूखंड संख्या 514, 515, 524 और 525 से संबंधित है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह विवाद वर्ष 1997 से न्यायालय में लंबित था। मामले में वर्ष 2008 में स्थगन आदेश भी पारित हुआ था। इसके बावजूद प्रकरण में विधिक पैरवी जारी रही। सरकारी भूमि को कब्जामुक्त कराने के अभियान के दौरान यह पुराना मामला प्रशासन के संज्ञान में आया। इसके बाद देवीपाटन मंडल की मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल ने प्रकरण की दोबारा समीक्षा शुरू कराई। समीक्षा के दौरान अभिलेखों, न्यायालयीन स्थिति और मौके पर जमीन की वास्तविक स्थिति की जानकारी जुटाई गई।

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प्रशासन की ओर से बताया गया कि पुराने प्रकरण की जानकारी सामने आने के बाद मंडलायुक्त ने मामले की लगातार समीक्षा की। संबंधित अभिलेखों और न्यायालय में मामले की स्थिति की पड़ताल कराई गई। अधिकारियों को सरकारी पक्ष मजबूती से रखने और शासकीय हितों की रक्षा के लिए प्रभावी विधिक पैरवी करने के निर्देश दिए गए। इस दौरान यह भी देखा गया कि संबंधित जमीन का मौके पर किस तरह उपयोग हो रहा था और उसकी वर्तमान स्थिति क्या है। इस प्रक्रिया में प्रशासन ने पुराने विवाद से जुड़े दस्तावेजों के साथ जमीन की भौतिक स्थिति पर भी ध्यान दिया।

प्रशासन की जांच के दौरान नजूल भूमि पर एक विद्यालय संचालित होने की जानकारी सामने आई। इसके बाद मौके की स्थिति की पड़ताल कराई गई। जांच के दौरान प्रशासन को वहां वर्तमान समय में कोई विद्यार्थी या शिक्षक नहीं मिला। इसके बाद जमीन की वास्तविक स्थिति की निगरानी भी की गई। यह जांच उस समय महत्वपूर्ण रही जब प्रशासन पुराने नजूल भूमि प्रकरण की न्यायालयीन स्थिति के साथ-साथ मौके पर सरकारी भूमि की स्थिति का भी आकलन कर रहा था।

प्रकरण में वादी/अतिक्रमणकारी दयानन्द मिश्र की ओर से न्यायालय में शपथ-पत्र प्रस्तुत किया गया। इसमें उन्होंने वाद में आगे पैरवी न करने और कार्यवाही समाप्त किए जाने का अनुरोध किया है। इस घटनाक्रम के साथ मामले में एक महत्वपूर्ण बदलाव यह हुआ कि संबंधित पक्ष ने न्यायालयीन पैरवी से पीछे हटने के साथ मौके से अपना कब्जा भी हटा लिया। इससे करीब तीन दशक पुराने मामले में न्यायालयीन प्रक्रिया और जमीन की मौके पर स्थिति, दोनों में बदलाव दर्ज हुआ है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस नजूल भूमि विवाद की शुरुआत वर्ष 1997 में हुई थी। इसके बाद मामला न्यायालय में लंबित रहा। वर्ष 2008 में स्थगन आदेश पारित हुआ, लेकिन प्रकरण पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। करीब तीन दशक तक लंबित रहने के बाद वर्ष 2026 में वादी की ओर से आगे पैरवी न करने का शपथ-पत्र दिया गया। साथ ही मौके से कब्जा हटाए जाने के बाद प्रशासन के सामने अब इन भूखंडों को सुरक्षित रखने और निर्धारित सरकारी प्रयोजन के लिए उपयोग सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है।

मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल के अनुसार, ये भूखंड देवीपाटन आयुक्त कार्यालय एवं भवन के लिए आरक्षित हैं। प्रशासन अब इन जमीनों को सुरक्षित रखते हुए निर्धारित शासकीय प्रयोजन में इनके उपयोग को सुनिश्चित करने की दिशा में कार्रवाई करेगा। प्रशासन की ओर से पुराने और लंबित मामलों की समीक्षा किए जाने की बात भी कही गई है। इसी प्रक्रिया के दौरान करीब 30 वर्ष पुराने इस नजूल भूमि प्रकरण की फाइल दोबारा समीक्षा में आई। मामले में न्यायालयीन स्थिति के साथ-साथ मौके की वास्तविक स्थिति की भी जांच की गई। इसके बाद संबंधित पक्ष की ओर से न्यायालय में आगे पैरवी न करने का अनुरोध और जमीन से कब्जा हटाने की कार्रवाई सामने आई।

नजूल भूमि सामान्य तौर पर ऐसी सरकारी भूमि होती है जिसका प्रबंधन और उपयोग निर्धारित सरकारी नियमों के तहत किया जाता है। इस मामले में संबंधित चार भूखंड मंडलायुक्त कार्यालय एवं भवन के लिए आरक्षित बताए गए हैं। ऐसे में वर्तमान प्रशासनिक कार्रवाई का प्रमुख हिस्सा जमीन को सुरक्षित रखना और उसके निर्धारित शासकीय प्रयोजन के अनुरूप उपयोग को सुनिश्चित करना है। प्रशासन के अनुसार, पुराने मामलों की समीक्षा के दौरान अभिलेखों की स्थिति, न्यायालय में लंबित प्रक्रिया और मौके पर भूमि की वास्तविक स्थिति को देखा जा रहा है।

मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल ने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मंशा के अनुरूप शासकीय भूमि का संरक्षण और जनहित में उसका उपयोग प्राथमिकता है। उनके अनुसार, करीब 30 वर्षों से लंबित इस प्रकरण में संबंधित पक्ष ने न्यायालय में आगे पैरवी न करने का अनुरोध किया है और मौके से भी कब्जा हटा लिया है। उन्होंने कहा कि अब भूमि को सुरक्षित रखते हुए निर्धारित शासकीय प्रयोजन में उपयोग सुनिश्चित किया जाएगा।

वादी के शपथ-पत्र और मौके से कब्जा हटाए जाने के बाद अब प्रशासन का ध्यान चारों नजूल भूखंडों की सुरक्षा पर है। इन भूखंडों को मंडलायुक्त कार्यालय एवं भवन के लिए आरक्षित बताया गया है। प्रशासन की ओर से इन जमीनों को सुरक्षित रखने तथा निर्धारित सरकारी उपयोग सुनिश्चित करने की दिशा में कार्रवाई आगे बढ़ाने की बात कही गई है।

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