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रसोई के बजट पर बढ़ता दबाव, त्योहारों से पहले सरकार की दालों की कीमतों पर लगाम लगाने की तैयारी

पिछले एक महीने में चना, मूंग, मटर और तूर की कीमतें 10% तक बढ़ी हैं। त्योहारों से पहले घरेलू आपूर्ति बढ़ाने के लिए आयात शुल्क में बदलाव का विकल्प देखा जा रहा है।
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Bureau News Desk
01 Oct 2026
06:28 PM
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रसोई के बजट पर बढ़ता दबाव, त्योहारों से पहले सरकार की दालों की कीमतों पर लगाम लगाने की तैयारी
हाइलाइट्स
सरकार चना और पीली मटर के आयात शुल्क में कटौती पर विचार कर रही है।
पिछले एक महीने में चना, मूंग, मटर और तूर की कीमतें 10% तक बढ़ी हैं।
चने पर 10% और पीली मटर पर 30% आयात शुल्क लागू है।
दक्षिण-पश्चिम मानसून में लगभग 12% कम बारिश दर्ज की गई है।

त्योहारों का मौसम नजदीक आने के साथ ही रसोई के बजट पर दालों की बढ़ती कीमतों का असर दिखाई देने लगा है। पिछले कुछ सप्ताह में प्रमुख दालों के भाव में तेजी दर्ज की गई है। इस स्थिति के बीच केंद्र सरकार घरेलू बाजार में उपलब्धता बढ़ाने के लिए आयात नीति में बदलाव के विकल्प पर विचार कर रही है। इस प्रस्ताव के केंद्र में चना और पीली मटर हैं। दोनों पर लगने वाले आयात शुल्क में संभावित कटौती को लेकर चर्चा है। इसके पीछे मानसून की बारिश में कमी, फसलों की पैदावार को लेकर चिंता और आगामी त्योहारी मांग जैसे कारण बताए जा रहे हैं।

दालों के बाजार में पिछले एक महीने के दौरान कीमतों में तेजी देखी गई है। चना, मूंग, मटर और तूर के दाम इस अवधि में 10 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं। बीते एक सप्ताह में भी इनकी कीमतों में लगभग 3 से 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। बाजार में इस तेजी के पीछे फसल की संभावित कमी और त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने की आशंका को प्रमुख कारण बताया जा रहा है। दालें भारतीय परिवारों के दैनिक भोजन का अहम हिस्सा हैं। ऐसे में इनके दाम में लगातार बढ़ोतरी का सीधा संबंध घरेलू खाद्य खर्च से है। सरकार जिन दो दालों पर आयात शुल्क कम करने के विकल्प पर विचार कर रही है, उनमें चना और पीली मटर शामिल हैं। मौजूदा शुल्क व्यवस्था के अनुसार:

  • चना: आयात पर 10 प्रतिशत शुल्क।
  • पीली मटर: आयात पर 30 प्रतिशत शुल्क।
  • तूर: 31 मार्च 2027 तक आयात शुल्क से छूट।
  • उड़द: 31 मार्च 2027 तक आयात शुल्क से छूट।

चना और पीली मटर पर शुल्क कम करने का उद्देश्य विदेश से इनके आयात को बढ़ावा देकर घरेलू बाजार में उपलब्धता बढ़ाना है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह प्रस्ताव विचाराधीन है। आयात शुल्क में कटौती को लेकर अंतिम सरकारी निर्णय की पुष्टि नहीं हुई है।

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त्योहारों के दौरान खाद्य पदार्थों की मांग में सामान्यतः बढ़ोतरी होती है। दालों की कीमतों को लेकर मौजूदा चिंता के पीछे मांग के साथ-साथ कृषि उत्पादन की स्थिति भी महत्वपूर्ण है। इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून में बारिश सामान्य से लगभग 12 प्रतिशत कम रही है। इसके अलावा बारिश का वितरण भी एक समान नहीं रहा। कई प्रमुख कृषि क्षेत्रों में लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति और मिट्टी में नमी की कमी रही, जबकि कुछ क्षेत्रों में तेज बारिश दर्ज की गई। दालों की फसल के लिए बारिश का समय और नमी की उपलब्धता महत्वपूर्ण होती है। इसलिए कुल बुवाई क्षेत्र में बड़ी गिरावट नहीं होने के बावजूद पैदावार को लेकर चिंता बनी हुई है। मानसून की कमी के बावजूद खरीफ दालों का कुल बुवाई क्षेत्र पिछले वर्ष की तुलना में बढ़ा है। 4 सितंबर तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार:

विवरण बुवाई क्षेत्र
चालू वर्ष में खरीफ दालें 117.13 लाख हेक्टेयर
पिछले वर्ष खरीफ दालें 115.30 लाख हेक्टेयर
चालू वर्ष में मूंग 33.19 लाख हेक्टेयर
पिछले वर्ष मूंग 34.23 लाख हेक्टेयर

कुल खरीफ दालों का बुवाई क्षेत्र पिछले साल की तुलना में अधिक है, लेकिन मूंग की बुवाई में कमी दर्ज की गई है। यह अंतर बताता है कि केवल बुवाई के कुल रकबे के आधार पर उत्पादन का आकलन करना पर्याप्त नहीं है। फसल के विकास के दौरान मौसम और नमी की स्थिति भी महत्वपूर्ण रहेगी।

दालों के प्रमुख उत्पादक राज्यों में महाराष्ट्र और कर्नाटक की बारिश की स्थिति पर व्यापारियों की नजर है। इन क्षेत्रों में फसल के महत्वपूर्ण चरणों में नमी की कमी से उत्पादन प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। दाल मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष सुरेश अग्रवाल के अनुसार, मुख्य उत्पादक राज्यों में बारिश की कमी से इस साल दालों की पैदावार पर काफी असर पड़ सकता है। फिलहाल चिंता बुवाई के कुल क्षेत्रफल से अधिक वास्तविक उत्पादन को लेकर है। यदि फसल की पैदावार प्रभावित होती है, तो घरेलू बाजार में उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है।

चना और पीली मटर पर आयात शुल्क में संभावित कटौती का प्रमुख उद्देश्य घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ाना है। आयात शुल्क कम होने से विदेश से आने वाली दालों की लागत पर असर पड़ सकता है। इससे व्यापारियों के लिए आयात की स्थिति बदल सकती है और बाजार में उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, आयात शुल्क में बदलाव का खुदरा कीमतों पर कितना असर पड़ेगा, यह आयात की मात्रा, अंतरराष्ट्रीय बाजार के भाव, घरेलू मांग और आपूर्ति की स्थिति पर निर्भर करेगा। इसलिए शुल्क में संभावित कटौती को तत्काल खुदरा कीमतों में कमी के रूप में देखना उचित नहीं होगा।

दालों के आयात शुल्क पर विचार के बीच केंद्र सरकार ने पिछले सप्ताह कई खाद्य तेलों पर आयात शुल्क में कटौती की थी। इस बदलाव के तहत कच्चे पाम तेल और कच्चे सोयाबीन तेल पर मूल सीमा शुल्क 5 प्रतिशत कर दिया गया। वहीं, कच्चे सूरजमुखी तेल पर मूल आयात शुल्क पूरी तरह हटा दिया गया। खाद्य तेलों से जुड़े इस फैसले के बाद दालों पर संभावित शुल्क कटौती का प्रस्ताव भी घरेलू खाद्य बाजार में आपूर्ति और कीमतों को संतुलित करने से जुड़ा है।

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